वक्त के कर्कश थपेडों ने
खडा कर दिया आज मुझे
उस मोड पर
जहां से
पीछे हटने का नहीं है हौसला मुझमें
आगे बढने की ताकत नहीं मुझमें
ये एक मोड जिंदगी का मेरे
है खतरनाक
चंद कांटे ही कांटे हैं
न कोई फूल दामन में मेरे
पराए तो पराए ही थे
अब न रहे अपने भी मेरे
चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने
Friday, 24 April 2009
Sunday, 19 April 2009
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
कितने ही अफसाने कहते हो
होता है मीठा सा अहसास
उन तानों में भी जो तुम देते हो
विरह वेदना से हो पीडित
याद मुझे तुम करते हो
जब भी ताने तुम देते थे
अब भी ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
क्या तुम्हें नहीं पता दूरी बढाती है प्यार
विरहनी बनी थी मीरा
राधा ने भी रस चखा
चखकर तुम भी रस विरह का
ताने हजार देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
इस विरह में तुम्हारे
दिन तो गुजर जाता है
आते आते शाम और फिर रात के
ये दिल पगला सा जाता है
और कोसता हूं इस विरह को मैं भी
जिसमें ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
कितने ही अफसाने कहते हो
होता है मीठा सा अहसास
उन तानों में भी जो तुम देते हो
विरह वेदना से हो पीडित
याद मुझे तुम करते हो
जब भी ताने तुम देते थे
अब भी ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
क्या तुम्हें नहीं पता दूरी बढाती है प्यार
विरहनी बनी थी मीरा
राधा ने भी रस चखा
चखकर तुम भी रस विरह का
ताने हजार देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
इस विरह में तुम्हारे
दिन तो गुजर जाता है
आते आते शाम और फिर रात के
ये दिल पगला सा जाता है
और कोसता हूं इस विरह को मैं भी
जिसमें ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
Tuesday, 14 April 2009
मैं कवि बनता नहीं
खाली कागज पर
नीली स्याही वाले पैन से
चंद आडी तिरक्षि लकीरें
खींचने से
कोई कविता नहीं बनती
न ही कोई
कवि बन जाता ऐसे ही
कवि बनने के लिए
अपना दिल बाहर निकाल
खून से उस पर लिखना
आंसुओं से उसको सींचना
और फिर
मन के किसी कोने से
दिमाग के किसी हिस्से से
डालना होता है
थोडा आत्मविश्वास उस पर
रचने पडते हैं संवाद
यूं ही कोई भावनाओं में बहकर
कवि नहीं बन जाता
कब से समझा रहा हूं अपने आप को
मगर दिल सुनता नहीं
मन किसी की मानता नहीं
दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं
नीली स्याही वाले पैन से
चंद आडी तिरक्षि लकीरें
खींचने से
कोई कविता नहीं बनती
न ही कोई
कवि बन जाता ऐसे ही
कवि बनने के लिए
अपना दिल बाहर निकाल
खून से उस पर लिखना
आंसुओं से उसको सींचना
और फिर
मन के किसी कोने से
दिमाग के किसी हिस्से से
डालना होता है
थोडा आत्मविश्वास उस पर
रचने पडते हैं संवाद
यूं ही कोई भावनाओं में बहकर
कवि नहीं बन जाता
कब से समझा रहा हूं अपने आप को
मगर दिल सुनता नहीं
मन किसी की मानता नहीं
दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं
Thursday, 9 April 2009
घर तो घर था
घर तो घर था
घर हुआ करता था
भाई बहन मां बाप
सब के रहने से
घर बना हुआ था
घर धीरे धीरे बनता गया मकान
मकान में कुछ लोगों के रहने से
मकान मकान ही रहा
न बन सका घर
घर हुआ करता था
भाई बहन मां बाप
सब के रहने से
घर बना हुआ था
घर धीरे धीरे बनता गया मकान
मकान में कुछ लोगों के रहने से
मकान मकान ही रहा
न बन सका घर
बीत गए बरसों
Wednesday, 8 April 2009
माएं नी माएं मैं इक शिकरा यार बनाया
नमस्कार साथियों आज मुझे मेरे एक दोस्त ने शिव कुमार बटालवी की आवाज का जादू का लिंक चंडीगढ से भेजा सुना तो दिल बाग बाग हो गया और सोचा कि क्यों ना आपको भी इस जादू को सुनाकर व दिखाकर मोहित कर लिया जाए तो पेश है आप सबकी खिदमत में शिव कुमार बटालवी की माए नी माए मैं एक शिकरा यार बनाया
सुनिए और फिर बताइये कैसा लगा आपको यह गीत


सुनिए और फिर बताइये कैसा लगा आपको यह गीत

Sunday, 5 April 2009
मेरे अपने बारे में
जब भी मैं सोचता हूं अपने बारे में
कि मैं क्या हूं
अंदर झांकता हूं
तो पाता हूं
कुछ भी नहीं मैं
कभी सोचता हूं कि
किसी कवि की लिखी
किसी कविता के
शब्द में लगी मात्रा की आवाज का
सौंवा भाग भी नहीं हूं
कभी सोचता हूं कि
धरा पर लगे वृक्षों के पत्ते पर पडी
ओस की बूंद का
सौवां भाग भी नहीं हूं
कभी सोचता हूं कि
रिमझिम गिरती बारिश की एक बूंद
जो बादलों से गिरकर बिखर गई
उसके छोटे से भाग के समान भी नहीं हूं
तब मैं सोचता हूं कि
लोग क्यों कहते हैं कि
तुम ये हो तुम वो हो
क्या लोग सही हैं
यदि हैं तो मुझे क्यों नहीं दिखता
क्यों नहीं महसूस होता
क्यों नहीं सोच पाता कि
हां मैं हूं
मैं हूं बहुत कुछ
कि मैं क्या हूं
अंदर झांकता हूं
तो पाता हूं
कुछ भी नहीं मैं
कभी सोचता हूं कि
किसी कवि की लिखी
किसी कविता के
शब्द में लगी मात्रा की आवाज का
सौंवा भाग भी नहीं हूं
कभी सोचता हूं कि
धरा पर लगे वृक्षों के पत्ते पर पडी
ओस की बूंद का
सौवां भाग भी नहीं हूं
कभी सोचता हूं कि
रिमझिम गिरती बारिश की एक बूंद
जो बादलों से गिरकर बिखर गई
उसके छोटे से भाग के समान भी नहीं हूं
तब मैं सोचता हूं कि
लोग क्यों कहते हैं कि
तुम ये हो तुम वो हो
क्या लोग सही हैं
यदि हैं तो मुझे क्यों नहीं दिखता
क्यों नहीं महसूस होता
क्यों नहीं सोच पाता कि
हां मैं हूं
मैं हूं बहुत कुछ
Wednesday, 1 April 2009
बिसरी यादें मूर्ख दिवस की
बात आज से ठीक पांच साल पहले की है। मेरी शादी के ठीक 20 दिन बाद मूर्ख दिवस यानी आज का दिन आ जाता है। हांलांकि कभी इस दिवस को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन उस बार जो मूर्ख बनाया कि आज तक इस बात को याद कर मेरी श्रीमती जी अभी भी हंसते हंसते लोट पोट हो जाती है। हुआ यूं कि 1 अप्रेल को मैंने सुबह सुबह बोल दिया कि चलो आज दीदी के घर चलते हैं। दीदी मेरे घर से करीब 35 किलोमीटर दूर हैं। तो श्रीमती जी बहुत खुश हो गईं। और थैंक्यू कहते हुए तैयार होने के लिए चली गई। बाद में उन्हें ऐसा आभास हुआ कि कहीं कुछ गडबड है तो उन्होंने सोचा कि ये कभी कोई काम घरवालों से बिना पूछे नहीं करते तो क्यों ना घरवालों से खासकर मम्मी से पूछ लेती हूं। वह तुरंत मम्मी के पास जाकर बोली कि क्या हम सच में ही जा रहे हैं। मम्मी ने बोला कहां जा रहे हो। तो मम्मी बोली कि मुझे तो पता नहीं। अब यह बात मैंने बाकी तो सब से कर ली थी लेकिन मम्मी से नहीं कर पाया। बीच में आकर बडे भईया बोले कि हां मेरे से बोल रहा था चले जाओ लेकिन शाम को जल्दी आ जाना। अब श्रीमती के पैर तो आसमान में। क्योंकि दीदी से बहुत पटती है उसकी और दीदी भी कई बार बोल चुकी थी सो बहुत खुश थी। अब बोलने लगी मैं क्या पहन कर चलूं तो मैंने कहा कि कोई अच्छी सी साडी पहन लो लंगहा चुन्नी पहन लो तो खुद ही बीच में बोल उठीं कि लांचा पहन लूं। मैंने कहा कि यार नहीं लांचा नहीं। तो उन्होंने मम्मी से जाकर सिफारिश लगा दी। और मम्मी ने बोल दिया तो मेरी क्या मजाल कि मैं मना कर दूं। तैयार हुए अच्छे से एक डेढ घंटा लगाकर। फिर घर से चले और जाकर सडक वाले पुराने घर पर बिठा दिया। बोली क्या हुआ। मैंने कहा हो गया अप्रेल फूल।
पहले तो काफी देर तक वह रोती रही फिर मेरे से घर ना जाने की जिद करने लगी बोली कि अब मैं शाम होने से पहले घर नहीं जाऊंगी। अभी कुछ खाया भी नहीं था बेचारी मूर्ख बनायी सो लभाब में। अब मूर्ख बनाया हे तो मूर्ख को निभाना भी हमें ही है। फिर उनके लिए खाने पीने का इंतजाम किया और वहीं दोपहर में पुराने घर में सो गए। हुई शाम तो उन्हें लेकर घर गए। घर पर हंसी खुशी का माहौल देखते ही बनता था। उस दिन वो अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली किसी के सामने। सच में बहुत ही अच्छा खुशी भरा दिन था वो यादगार दिन। लेकिन अब शायद पता नहीं कब ऐसा दिन आएगा।
पहले तो काफी देर तक वह रोती रही फिर मेरे से घर ना जाने की जिद करने लगी बोली कि अब मैं शाम होने से पहले घर नहीं जाऊंगी। अभी कुछ खाया भी नहीं था बेचारी मूर्ख बनायी सो लभाब में। अब मूर्ख बनाया हे तो मूर्ख को निभाना भी हमें ही है। फिर उनके लिए खाने पीने का इंतजाम किया और वहीं दोपहर में पुराने घर में सो गए। हुई शाम तो उन्हें लेकर घर गए। घर पर हंसी खुशी का माहौल देखते ही बनता था। उस दिन वो अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली किसी के सामने। सच में बहुत ही अच्छा खुशी भरा दिन था वो यादगार दिन। लेकिन अब शायद पता नहीं कब ऐसा दिन आएगा।
Saturday, 28 March 2009
मैं बेरोजगार हूं मुझे नौकरी दे दो
डूबते हुए आदमी ने
पुल पर चलते हुए आदमी को
आवाज लगाई बचाओ बचाओ
पुल पर चलते आदमी ने नीचे
रस्सी फेंकी और कहा आओ
नदी में डूबता हुआ आदमी
रस्सी नहीं पकड पा रहा था
रह रह कर चिल्ला रहा था
मैं मरना नहीं चाहता
जिंदगी बहुत महंगी है
कल ही मेरी एमएनसी में नौकरी लगी है
इतना सुनते ही पुल पर चलते
उस आदमी ने अपनी रस्सी खींच ली
और भागता भागता एमएनसी गया
उसने वहां के एचआर को बताया कि
अभी अभी एक आदमी डूबकर मर गया है
और इस तरह आपकी कंपनी में
एक जगह खाली कर गया है
मैं बेरोजगार हूं मुझे नौकरी दे दो
एचआर बोला दोस्त
तुमने आने में थोडी देर कर दी
अब से कुछ देर पहले ही
इस नौकरी पर उस आदमी को लगाया है
जो उस आदमी को धक्का देकर
पहले यहां आया है
कुछ दिन पहले मेरे एक दोस्त की मेल आई मेल पढी तो लगा कि हां यह अपने ब्लाग पर सांझा किया जा सकता है और पेश कर दी आपकी खिदमत में
Wednesday, 25 March 2009
मंजिल की विसात ही क्या
मंजिल ही न रही अब कोई
रास्ता भी मैं भटक गया
सोचा था साथ दे देंगे मेरे कदम
चलेंगे मेरे साथ दूर तलक
मिल जाएगी मंजिल
होगी आसान डगर
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या
अब अपनों ने मुंह फेर लिया
दुनिया का भरोसा क्या करना
जब दोस्त ही दुश्मन बन गए
तो गैरों की बात ही क्या करना
किससे कहना किसको सुनना
है तकदीर का ये फसाना
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या
की थी कोशिश पकड उंगली चलने की
चला था कुछ दूर साथ उनके
छोड बीच राह में अकेले
चले गए मेरी उंगली थामने वाले
जब उंगली ने ही साथ छोड दिया
तो थामने वालों की बात ही क्या
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या
रास्ता भी मैं भटक गया
सोचा था साथ दे देंगे मेरे कदम
चलेंगे मेरे साथ दूर तलक
मिल जाएगी मंजिल
होगी आसान डगर
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या
अब अपनों ने मुंह फेर लिया
दुनिया का भरोसा क्या करना
जब दोस्त ही दुश्मन बन गए
तो गैरों की बात ही क्या करना
किससे कहना किसको सुनना
है तकदीर का ये फसाना
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या
की थी कोशिश पकड उंगली चलने की
चला था कुछ दूर साथ उनके
छोड बीच राह में अकेले
चले गए मेरी उंगली थामने वाले
जब उंगली ने ही साथ छोड दिया
तो थामने वालों की बात ही क्या
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या
Subscribe to:
Comments (Atom)
