Thursday, 9 April 2009

घर तो घर था

घर तो घर था
घर हुआ करता था
भाई बहन मां बाप
सब के रहने से
घर बना हुआ था
घर धीरे धीरे बनता गया मकान
मकान में कुछ लोगों के रहने से
मकान मकान ही रहा
न बन सका घर

17 comments:

"अर्श" said...

waah sahib bahot hi gambhir baat ko likha hai aapne... aur itni aasaani se ke kya kahun... badhaayee swikaaren...


arsh

अनिल कान्त : said...

bahut sahi baat kahi

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

apki post ki charcha mere blaag me
समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : जो पैरो में पहिनने की चीज थी अब आन बान और शान की प्रतीक मानी जाने लगी है

parminder said...

bahut achcha likha hai aap ne ki parivar se hi gar kehlata hai. parivar kr bins to sirf mkan hi hota hai.

अल्पना वर्मा said...

bahut sahi likha hai Mohan ji,

ghar to rahne walon se hi banta hai..varna wah makaan hai.



[आज कल नेट पर बहुत कम आना हो पा रहा है इस लिए पोस्ट पर देर से आने पर माफ़ी चाहूंगी.]

irdgird said...

घर के मकान में बदलने की पीड़ा आज महानगरों का ही नहीं कस्‍बों का भी हिस्‍सा बन चुकी है।

डाकिया बाबू said...

दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में ब्लॉग वार्ता के अंतर्गत "डाकिया डाक लाया" ब्लॉग की चर्चा की गई है। रवीश कुमार जी ने इसे बेहद रोचक रूप में प्रस्तुत किया है. इसे सम्बंधित लिंक पर जाकर देखें:- http://dakbabu.blogspot.com/2009/04/blog-post_08.html

mark rai said...

jindagi to yahi aakar mili...

Dileepraaj Nagpal said...

Innt-Gaare Se To Makaan Bana Karte Hain, Ghar To Pyaar Mohaabaat Se Bna Karte Hain...

Harkirat Haqeer said...

घर धीरे धीरे बनता गया मकान
मकान में कुछ लोगों के रहने से
मकान मकान ही रहा
घर न बन सका

वाह ...वाह...मोहन जी ......!!

बहोत गहरी बात कह गए आप तो....!!

Science Bloggers Association said...

एक घर को बनाना इतना भी नहीं आसां।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

Navnit Nirav said...

baat agar sidhe dil par lag jaaye to kavit ka arth pura hota hai.......aur aap is mein saphal hue hain.
Dhanyawad
Navnit Nirav

shama said...

Aapkee is rachnaane mujhe apne bachpankaa ghar yaad dila diya"Wo ghar bulata hai.." is tehet mere "Kavita" blogpe ek rachna hai..

नीरज गोस्वामी said...

बहुर सुन्दर रचना है मोहन जी...आपकी इस रचना को पढ़ कर मुझे एक शेर याद आ गया:
या खुदा मुझ पर बस इतना करम कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उसे घर कर दे

नीरज

freespaceofindia said...

good keep it up!

Udan Tashtari said...

सटीक कहा!!

घर और मकान-कितना फासला है.

archana said...

makan aur gher ke darmiyaan bhi kuch hota hai...

jo gher ko makan aur makan ko gher bana deta hai.....

aapki rachana dil ko choo gai