Sunday, 5 April 2009

मेरे अपने बारे में

जब भी मैं सोचता हूं अपने बारे में
कि मैं क्‍या हूं
अंदर झांकता हूं
तो पाता हूं
कुछ भी नहीं मैं

कभी सोचता हूं कि
किसी कवि की लिखी
किसी कविता के
शब्‍द में लगी मात्रा की आवाज का
सौंवा भाग भी नहीं हूं

कभी सोचता हूं कि
धरा पर लगे वृक्षों के पत्‍ते पर पडी
ओस की बूंद का
सौवां भाग भी नहीं हूं

कभी सोचता हूं कि
रिमझिम गिरती बारिश की एक बूंद
जो बादलों से गिरकर बिखर गई
उसके छोटे से भाग के समान भी नहीं हूं

तब मैं सोचता हूं कि
लोग क्‍यों कहते हैं कि
तुम ये हो तुम वो हो
क्‍या लोग सही हैं
यदि हैं तो मुझे क्‍यों नहीं दिखता
क्‍यों नहीं महसूस होता
क्‍यों नहीं सोच पाता कि
हां मैं हूं
मैं हूं बहुत कुछ

23 comments:

Anonymous said...

आपकी यह कविता अच्छी लगी। अत्मानुसंधान से ही कविता निखरती हैं। लिखते रहिये। आशा है आप बेहद संभावनाओं से युक्त कवि हो पायेंगे।-
सुशील कुमार

राज भाटिय़ा said...

मोहन जी बहुत ही सुंदर लगी आप की यह कविता, बहुत कुछ कह रही है.
धन्यवाद

MANVINDER BHIMBER said...

rachna ne nishabad kar diya...kya comment kiya jae

mehek said...

main hun bahut kuch,waah khud ki talash yahi khatam hoti hai tab,sunderbhav sunder rachana

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत उम्दा रचना.

रामराम.

जितेन्द़ भगत said...

अस्‍ति‍त्‍वबोध के लि‍ए आत्‍मबोध अनि‍वार्य है, ऐसी कवि‍ता ही आज के समय की सही तस्‍वीर पेश करती है, साथ ही ऐसा लगता है हम एक तरफ ब्रह्मांड की वि‍राटता का अन्‍वेषण कर रहे हैं, दूसरी तरफ अपने अस्‍ति‍त्‍व की छुद्रताओं से ग्रसि‍त भी होते जा रहे हैं, आपकी यह कवि‍ता इस बोध से नि‍जात भी दि‍लाती है। (पर मेरी कवि‍ता में यह नि‍जात नहीं है।)

डॉ. मनोज मिश्र said...

हां मैं हूं
मैं हूं बहुत कुछ.........
यही सही है ,
आपने देकार्त की उक्ति सुनी होगी कि- i think- i am .अच्छी रचना .

संदीप शर्मा said...

बहुत उम्दा... सुंदर कविता

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अगर व्यक्ति खुद अपनी कद्र करने लगे तभी दुसरे उसकी कद्र करना शुरू कर देंगे

P.N. Subramanian said...

आदमी के लिए सोचना जरूरी है. अच्छी रचना.

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

सुन्दर ..उम्दा प्रस्तुति.

Udan Tashtari said...

अरे मोहन भाई

हीरा कब जान पाया है कि वो हीरा है. वो तो खुअ को पत्थर माने पड़ा रहता है और जोहरी आंक लेता है.


-बहुत खूब रचना कही.

seema gupta said...

अपनी तलाश अपनी पहचान तो सारी उम्र जारी रहती है...... और इंसान कभी भी to संतुष्ट नहीं होता......और ये तलाश जारी ही रहे तो अच्छा है कम से कम इस कोशिश मे hm बहुत कुछ करते चले जाते हैं.....सुंदर भावः और अभिव्यक्ति....
Regards

अल्पना वर्मा said...

यह कविता आप ने बहुत ही अच्छी लिखी है.

'किसी कवि की लिखी
किसी कविता के
शब्‍द में लगी मात्रा की आवाज का
सौंवा भाग भी नहीं हूं'

अपनी तलाश में आप ने उपमान अच्छे तलाशे हैं..
भाव अभिव्यक्ति अच्छी लगी..

[आप के ब्लॉग पेज पर आप की कविता नज़र नहीं आती..सिर्फ काला पन्ना और गिरती बर्फ..
पेज की फीड पर जा कर पढ़ती हूँ .]

PREETI BARTHWAL said...

बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना .सुन्दर बात कही आपने

अनिल कान्त : said...

मुझे पसंद आयी

Science Bloggers Association said...

अपने बारे में कहना सुंदर मुश्किल है।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

विनय said...

ख़ूब शब्दों में पिरो लिया आपने ख़ुद को!


मोहन जी, ब्लॉग पर लिखना थोड़ा धीमा इसलिए हो गया कि कुछ और भी ज़रूरी काम हैं जिनको निपटाना रहता है!

Charchaa | चर्चा इस साइट के निर्माण का भार आजकल मुझप है!

ilesh said...

Mohan ji bahut hi achha raha ye safar khud ko pehchan ne ka...

vandana said...

kya aur kin shabdon mein tarif karun aapki aur aapki gahan soch ki.jis main ko maine kai baar likha magar hamesha adhura hi raha lagta hai aapne to use poora hi pakad liya.

bahut hi nayab likha hai aur bahut hi gahri soch ke sath.

vandana said...

kya aur kin shabdon mein tarif karun aapki aur aapki gahan soch ki.jis main ko maine kai baar likha magar hamesha adhura hi raha lagta hai aapne to use poora hi pakad liya.

bahut hi nayab likha hai aur bahut hi gahri soch ke sath.

Babli said...

बहुत बहुत शुक्रिया आपके ख़ूबसूरत कमेन्ट के लिए!
मुझे आपकी ये रचना इतनी पसंद आई कि मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती!