Tuesday, 14 April 2009

मैं कवि बनता नहीं

खाली कागज पर
नीली स्‍याही वाले पैन से
चंद आडी तिरक्षि‍ लकीरें
खींचने से
कोई कविता नहीं बनती
न ही कोई
कवि बन जाता ऐसे ही
कवि बनने के लिए
अपना दिल बाहर निकाल
खून से उस पर लिखना
आंसुओं से उसको सींचना
और फिर
मन के किसी कोने से
दिमाग के किसी हिस्‍से से
डालना होता है
थोडा आत्‍मविश्‍वास उस पर
रचने पडते हैं संवाद
यूं ही कोई भावनाओं में बहकर
कवि नहीं बन जाता
कब से समझा रहा हूं अपने आप को
मगर दिल सुनता नहीं
मन किसी की मानता नहीं
दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं

33 comments:

जितेन्द़ भगत said...

कॉलरि‍ज से लेकर इलि‍यट तक ने भी इस बारे में कुछ लि‍खा है... कि‍ कवि‍ता लि‍खने के लि‍ए कि‍स मन:स्‍थि‍ति‍ से गुजरना पड़ता है।
पर एक बात है, कवि‍ता न लि‍ख पाने के दर्द को भी आपने कवि‍ता के माध्‍यम से बताने की अच्‍छी कोशि‍श की:)

अल्पना वर्मा said...

'और मैं कवि बनता नहीं'
ऐसा तो नहीं है मोहन जी,
यह जो आप ने लिखा है वह तो कविता ही है..एक कविता जो बता रही है..कविता लिखी कैसे और कब जाती है..जब भावों को शब्दों का सहारा दे दो तो कविता हुई!अब आपने अपने भावों की अभिव्यक्ति इतने सुन्दर ढंग से कर दी और हो गयी एक कविता!
फिर यह कहना 'मैं कवि नहीं 'यह तो विरोधाभास ही हुआ न!
ऐसे ही लिखते रहीये!

Urmi said...

Mohan ji

mashallah kya baat hai!!!

yun hi likhte rahiye aur hum iska lutf uthayenge!

Urmi (Babli)

mehek said...

aare waah itani gazab ki kavita likhi bhi aur kehte hamne nahi likhi,bahut sunder bhav saji kavita likh bhi di hai aapne,badhai.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बढिया अंदाज . शुभकामनाएं.

रामराम.

डॉ .अनुराग said...

थोडा आत्‍मविश्‍वास उस पर
रचने पडते हैं संवाद
यूं ही कोई भावनाओं में बहकर
कवि नहीं बन जाता
कब से समझा रहा हूं अपने आप को
मगर दिल सुनता नहीं
मन किसी की मानता नहीं
दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं


अद्भुत......

अनिल कान्त : said...

वाह साहब ..वाह ...तारीफ़ के लिए शब्द कम हैं

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

hempandey said...

कविवर सुमित्रा नंदन पन्त ने भी कहा है -

कुछ सीधे टेढ़े आँखर कागज़ पर लिख
उनको गीत छंद कह
मैं भी संभवतः सर्वज्ञ समझता हूँ
अब अपने को, गौरव से फूला !

freespaceofindia said...

mohan lines kaaphi saral hai isliye aapka bhaav to spasht hai lekin sach kahu to is rachna mein creativity naam ki koi cheej mujhe nahi lagi .don't take anything otherwise mujhe padhkar aisa laga ki jaldbaaji mein likhi hui rachna hai ki mujhe likhna hai bas . aapki aur rachnao ko maine padha . aap kaaphi achcha likhte hai keep it up!

आलोक सिंह said...

वाह क्या धांसू कविता लिखी है
और कह रहे है
कब से समझा रहा हूं अपने आप को
मगर दिल सुनता नहीं
मन किसी की मानता नहीं
दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं
अब और कितना कवि बनेगे :)
:-)

मोहन वशिष्‍ठ said...

आप सभी का मैं तहेदिल से शुक्रगुजार हूं। और आप सभी का मेरे ब्‍लाग पर सुझावों के लिए सादर अभिनंदन है। ऋचा शर्मा जी सही मायनों में आपने जो बातें की हैं बिल्‍कुल सही है। हांलांकि मुझे अभी क ख ग भी कविता के बारे में नहीं पता बस आप सभी से सीख रहा हूं बहुत कुछ लोग हैं जो आप की तरह मुझे राह दिखाते हैं जिन पर मैं अमल करता हूं। आज काफी अच्‍छा लगा आपकी बातें पढकर वैसे सही मायनों में अगर शब्‍दों को क्रिएटिवीटी मिल जाए तो कविता क्रिएटिविटीक बन जाती है और इसके लिए मैं और अच्‍छा करने की कोशिश तो करता हूं और भी करूंगा आप का बहुत बहुत आभार

Reality Bytes said...

दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं

डॉ. मनोज मिश्र said...

कवि बनने के लिए
अपना दिल बाहर निकाल
खून से उस पर लिखना
आंसुओं से उसको सींचना
और फिर
मन के किसी कोने से
दिमाग के किसी हिस्‍से से
डालना होता है..........
बहुत सुंदर भाव हैं भाई जी ,बधाई -ऐसे ही लिखते रहिये .
.

संगीता पुरी said...

बहुत खूब ... कविताएं ऐसे ही नहीं बनती हैं।

शोभना चौरे said...

apne kavita hi likhi hai isiliye ap kvi hi huye .
achha pryas hai
shobhana chourey

शोभना चौरे said...

apne kvita hi likhi hai isiliye aap kvi hai
achha pryas hai
shobhana chourey

Shama said...

Kavitayen likhne lagee, par mai kavee nahee banee...naahee khudko lekhika keh saktee hun.....
Par ek saty jeevanse guzarte hue jaanaa....dardkee jab inteha hotee hai tabhee kisee kalaka janm hota hai...tabtak wo ek "craft" hee kehlaa saktee hai...
Ise kalakee " prasutee vednaa" hee samajh len chahen to....

seema gupta said...

मै कवी बनता नहीं...."
" बहुत ही सुंदर भाव व्यक्त किये है आपने इस कविता मे....सच कहा कवी बनने के लिए उन भावनाओ से गुजरना पड़ता है .."

Regards

G M Rajesh said...

bada ajeeb kam karte hain ji kavita likhne ke liye
kavita to yu hi utar aati hai agar saraswati ki krupa ho

Science Bloggers Association said...

पर अब तो बन गये भई, लिहाजा इस खुशी में कुछ हो जाए
----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

mark rai said...

कवि बनने के लिए
अपना दिल बाहर निकाल
खून से उस पर लिखना
आंसुओं से उसको सींचना
और फिर
मन के किसी कोने से
दिमाग के किसी हिस्‍से से
डालना होता है......
.. कविताएं ऐसे ही नहीं बनती...
...तारीफ़ के लिए शब्द कम ....
ऐसे ही लिखते रहीये!....

M.A.Sharma "सेहर" said...

और मैं कवी बनता नहीं....

मोहन जी ( how modest )

बस आपके जज्बात की प्रशंसा के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं

अति सुन्दर भाव व व्यथा !!!

अक्षर जब शब्द बनते हैं said...

कवि के इस शब्दकर्म पर हमारे समय के प्रतिबद्ध कवि-समालोचक मुक्तिबोध का विचार अत्यंत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है।उन्होंने सृजन-प्रक्रिया को तीन चरणों में बांटकर इसको समझाया है। कवि जब किसी बाहरी वस्तु या विचार के संपर्क में आता है तो उसके मन में विचार की तरंगे उठने लगती हैं और कल्पना का कार्य प्रारंभ हो जाता है,और बोधपक्ष यानी ज्ञानवृत्ति सक्रिय हो उठती है। मुक्तिबोध ने इस उदघाटन-क्षण को काव्य-कला का प्रथम-क्षण माना है। इसके अनंतर, उसके अंत:करण में पूर्व से संचित ज्ञान और जीवन-मूल्यों के अनुभव से उस तत्व का समागम और प्रतिक्रिया होता है। इसे सोखकर वह अंतस्तत्व जीवन के मार्मिक पक्ष से न्यस्त हो जाता है और एक संश्लिष्ट जीवन-बिंब-माला को उपस्थित कर देता है। इसे मुक्तिबोध ने कला का दूसरा क्षण माना है जिसमें हम अपनी अभिव्यक्ति के लिए छटपटाने लगते हैं। इस छटपटाहट को जब हम शब्द,रंग तथा स्वर में अभिव्यक्त करने लगते हैं तब कला का तीसरा क्षण शुरु हो जाता है। कला का यह क्षण दीर्घ होता है। इस क्षण में अभिव्यक्ति के स्तर तक आते-आते हमारे मनोमय तत्व-रुप बदलने लगते हैं। चूंकि भाषा हमारी सामाजिक संपदा है,अत:यह जहां रूप-तत्वों को घटाने-बढ़ाने का कार्य करती है और नवीन तत्व-रुप को मिला भी देती है वहीं नवीन शब्द-संयोग,नवीन अर्थवत्ता, नई भंगिमाएं और व्यंजनाएं भी प्रकट हो जाती हैं। यही वह समय है जब तत्व के अनुरूप कवि भाषा भी सिरजता है। समय और व्यवस्था की आंतरिक पेचीदगियों और सत्य की गहराई से टटोल के कारण इसीलिये भाषा कहीं- कहीं जटिल और वक्र भी हो जाती है।यह स्वाभाविक है। ऐसी कविताओं से आसानी की मांग करना उचित नहीं क्योंकि कविता का भी अपना काव्यशास्त्रीय अनुशासन होता है जिसको जाने-समझे बिना कविता का आसानी से समझ में आने की बात बेमानी लगती है। किन्तु कलात्मक प्रदर्शन के खयाल से जान-बूझकर दुरुह और जटिल बनायी गयी कविता निंदनीय है क्योंकि इससे लोक और जीवन का पक्ष क्षीण हो जाता है।
आशा है मोहन जी आप इस विचार से लाभान्वित होंगे। सादर , आपका,सुशील कुमार (sk.dumka@gmail.com)

Udan Tashtari said...

वाह कविराज!! :) अद्भुत अभिव्यक्ति!!

विनय said...

Read article about...

Blogging And Password Hacking Part-I

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah... Wah... Mohan Pyare...Wah
achhi kavita..
bhavpoorn..


or haan
Vijay Moudgil ka Mobile no. bhejo .......

manu said...

जागे मोहन प्यारे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
सुंदर कविता मोहन के मन से,,,,,,,,

राधिका उमडे़कर बुधकर said...

वाह वाह मोहन जी आप तो बहुत अच्छे कवी हैं ,बहुत ही सुंदर कविता के लिए आपको बधाई

Shama said...

Aapke lekhan ko kayi baar padhne aa jaatee hun..!

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ताऊ रामपुरिया said...

इष्टमित्रों और परिवार सहित आपको, दशहरे की घणी रामराम.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

क्या अब इस ब्लॉग पर कोई नई पोस्ट पढ़ने को नही मिलेगी?

हल्ला बोल said...

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क्या यही सिखाता है इस्लाम...? क्या यही है इस्लाम धर्म

Vinay Prajapati said...

नववर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...