कैसा लगा ? नंबर दे दो

Thursday, 5 November 2009

पेट की खातिर या ठंड की खातिर

किसी काम से दिल्‍ली जा रहा था। रास्‍ते में आधी रात को एक स्‍टेशन पर गाडी रूकी। आंख खुल गई। तो बाहर जो नजारा देखा उसे आपके सामने प्रस्‍तुत कर रहा हूं।

सुबह सुबह की मीठी मीठी
कुनकुनी सी ठंड
तन पर नाम मात्र कपडे
कंपकपाता जिस्‍म
सिकुड रहा है
अपने आप में
हाथ पेट की खातिर
आ रहा है चिथडों से बाहर
कोई राही
दे दे उसे रहम
राही उतरा एक
काम किया नेक
उतार कंबल अपना
ओढाया उसे
अब हाथ अंदर चला गया कंबल के
पेट की खातिर नहीं
ठंड से बचने की खातिर

Tuesday, 20 October 2009

मतलब की दुनिया

उफ ये दुनिया ये मतलब की दुनिया
ये चेहरों पे चेहरे लगाती है दुनिया
ये भोले ये मासूम सुंदर से चेहरे
मगर दिल में इनके हैं काले अंधेरे
मतलब के रिश्‍ते बनाती है दुनिया
फिर तन्‍हा एक दिन छोड जाती है दुनिया
कभी दोस्‍त बनके हंसाती है दुनिया

कभी बनके दु‍श्‍मन रुलाती है दुनिया
कभी प्‍यार से लगाकर गले
पीछे से खंजर चुभोती है दुनिया
कभी खूबसूरत चेहरे पे न जाना
दिल देखकर फिर दिल को लगाना
इंसान को यही सिखाती है दुनिया
है दौलत यहां हर रिश्‍ते से ऊपर
दौलत के लिए अपनों का खून
बहाती है दुनिया
ऊफ ये दुनिया ये मतलब की दुनिया
-रजनी वशिष्‍ठ
(नोट - यह कविता मेरी पत्‍नी द्वारा लिखित है । )

Thursday, 15 October 2009

दीपावली की शुभकामनाएं

दीपावली पर्व की आप सभी को समस्‍त परिवार सहित हार्दिक शुभकामनाएं  वैभव लक्ष्‍मी आप सभी पर कृपा बरसाएं। लक्ष्‍मी माता अपना आर्शिवाद बरसाएं।

दूर कहीं गगन के तले 
एक दीप की लौ नजर आई 
जाकर पास देखा उसके 
दीपक जल रहा था 
बिना तेल के 
मैंने पूछा दीपक से 
तेल नहीं तो कैसे जल रहे हो तुम 
तो दीपक ने जवाब दिया 
कि 
जिस तरह तुम इंसान 
बिना तेल और बाती के 
एक दूसरे से जल रहे हो 
वैसे ही मैं भी 
तुम इंसानों को देख कर 
जल रहा हूं 

छोड कर आपस का वैर
चलो जलाते हैं हम भी प्‍यार का दीपक
प्रेम को बना दीपक की बाती
इंसानियत से लो तेल का काम
फैलेगा शांति का प्रकाश चारो ओर
होंगे खुशहाल सभी 

Sunday, 27 September 2009

जिंदगी कुछ वक्‍त दे मुझे

मेरा अपना घर
जिससे हूं मैं दूर
बहुत दूर
गाहे बगाहे घर जाना
और 
जल्‍दी से घर से लौट वापस आना

क्‍या यही है जिंदगी
क्‍या यही है जिंदगी का दस्‍तूर

घर पर है मेरी बीमार मां
बीमार पिता

और मैं
अकेला
दूर घर से बहुत दूर
ना मां के दर्द को बांट पा रहा हूं
ना पिता की सेवा कर रहा हूं
आखिर क्‍यों
ऐसा जीवन जीने को मजबूर हूं
आखिर क्‍यों

क्‍या इसी को कहते हैं जीवन
क्‍या फायदा मेरे इस जीवन का
जो मैं अपनों के ही दुख दर्द में
उनका सहारा ना बनूं

क्‍यों नहीं कर पा रहा मैं उनकी सेवा
उनके बुढापे में
क्‍यों नहीं बन पा रहा मैं
उनके के बुढापे की लाठी
क्‍यों आखिर क्‍यों

क्‍यूं वक्‍त ले रहा इम्तिहान है
यूं ही ना गुजर जाए जिंदगी तमाम है
इम्तिहान से डरता नहीं हूं मैं
तूफानों से रूकता नहीं हूं मैं
सिर्फ मां के निस्‍वार्थ प्रेम को
भूलता नहीं हूं मैं
फिर कैसे उन्‍मुख हो जाऊं
कैसे कर्तव्‍य विमुख हो जाऊं
जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं

Monday, 21 September 2009

भारत धरती मां है हमारी

भारत धरती मां है हमारी
हम सब इसकी संतान
इससे है पहचान हमारी
हम इसकी पहचान
भारत धरती मां है हमारी 

हम हैं भारत के बच्‍चे
ये हमको है अभिमान
दुश्‍मन इस पर नजर जो डाले
ले लें उसकी जान
भारत धरती मां है हमारी 

अगर पडी जो इसे जरूरत
कभी हमारी जान की
इक पल की ना देर लगाएं
हंसकर दें बलिदान
भारत धरती मां है हमारी

(बिटिया के स्‍कूल में गीत फेस्‍टीवल था। तो कुछ सूझा नहीं हमारी पत्‍नी जी ने इन चार लाईनों को लिखा और बिटिया को सिखा दिया।  हमारी बिटिया ने उसे अपनी तोतली सी आवाज में अपनी टीचर को सुनाया और काफी खुश हुईं। )

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