Saturday, 22 December 2012

खून के आंसू

हर दिन एक न एक क्राईम का समाचार अखबारों और न्यूज चैनलों की सुर्खियां बना रहता है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब कोई मर्डर, रेप, अपहरण या चोरी डकैती न हुई हो। क्या हो गया है हमारे सभ्य समाज को? क्या आजादी इन्हीं कामों के लिए मिली थी? वाह रे मेरे देश प्रेमियों क्यों भारत माता को खून के आंसू रुला रहे हो। कुछ साल पहले किसी ने भविष्यवाणी की थी 21-12-2012 को प्रलय आएगी और दुनिया समाप्त हो जाएगी, आज वह प्रलय का दिन है लेकिन प्रलय भी इन वहशी दरिंदों से डर गई लगता है। मर्डर, रेप, अपहरण या चोरी डकैती जैसे घिनौने कुकृत्य आज हमारे इस सभ्य समाज की शोभा बढ़ा रहे हैं। शायद इस पर ही हम सब गर्व महसूस करते हैं। अगर आज गांधी, नेहरू, नेताजी बोस, लाला लाजपतराय, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे हमारे लिए अपनी जान को न्योछावर करने वाले जिंदा होते तो बहुत खुश होते हमारी इन नीच हरकतों को देखते हुए। वैसे आज अगर इन शहीदों की आत्मा कहीं से भी हमें देख रही होगी तो भारत माता जैसी पावन धरा की तरह वो भी खून के आंसू ज़ार-ज़ार रो रहे होंगे और सोच रहे होंगे कि क्यों हमने इन पापियों के लिए अपने प्राण न्योछावर किए? अभी हाल ही में दिल्ली में दिल दहला देने वाला हादसा सामने आया। एक 23 वर्षीय होनहार छात्रा को कुछ युवकों की हवश ने जिंदगी और मौत के बीच जूझने के लिए छोड़ दिया। सुनकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं। चार वहशी युवकों ने छात्रा को उसके साथी के सामने ही पहले मारा पीटा फिर उसके साथ दुष्कर्म जैसी गंदी घटना को अंजाम दिया और यही नहीं फिर लोहे की रॉड और डंडों से मारपीट कर चलती बस से नीचे फेंक दिया। बहुत ही शर्मनाक और वहशी घटना है। ऐसे लोगों को हमारे कानून में सजा के नाम पर सिर्फ कुछ सालों की कैद या फिर बाद में बेल दे दी जाती है। लेकिन अगर हम कुछ देशों अमेरिका के कुछ राज्य, चेक गणराज्य, दक्षिण कोरिया  जैसे कानून देखें जहां इस तरह की घटना को अंजाम देने वालों को नपुंसक बनाने का कानून है और अपने भारत में ऐसा कड़ा कानून क्यों नहीं है। हर रोज होने वाली इन रेप और गैंग रेप जैसी घटनाओं को रोकने के लिए चाहिए कि एक बहुत ही ज्यादा सख्त कानून बने जिसमें हो कि रेप करने वालों को सबसे पहले नपुंसक बनाया जाए फिर उसके हाथ पैर काटकर छोड़ दिया जाए ताकि मरते दम तक उनकी और ऐसे ही तमाम उन वहशी दरिंदों की रुह कांपती रहे ताकि ऐसा कदम उठाने से पहले बार-बार सोचे। और हो सकता है कि एक-दो के बाद शायद इस तरह की सजा देने की जरूरत भी न पड़े। ऐसे दरिंदों को मौत की सजा तो एक छोटी सी और साधारण सी बात है क्योंकि रेपिस्ट को अगर मौत दे दी जाए तो उसे मौत के बाद पता भी नहीं होगा कि उसने क्या किया जिसकी सजा उसे मिली और अगर ऐसी ही सजा का प्रावधान हो जाए तो ताउम्र वह सोचता ही रहेगा और तो और उसे देखकर अनेक तमाम खुले घूमने वाले भेडिये भी सोचेंगे।

2 comments:

Vinay Prajapati said...

नववर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

Vinay Prajapati said...

your blog feed is not correct right now please make it working...