Friday, 24 April 2009

न कोई फूल दामन में मेरे

वक् के कर्कश थपेडों ने
खडा कर दिया आज मुझे
उस मोड पर
जहां से
पीछे हटने का नहीं है हौसला मुझमें
आगे बढने की ताकत नहीं मुझमें
ये एक मोड जिंदगी का मेरे
है खतरनाक
चंद कांटे ही कांटे हैं
कोई फूल दामन में मेरे
पराए तो पराए ही थे
अब रहे अपने भी मेरे
चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने

21 comments:

Udan Tashtari said...

चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने

-जायज दर्द है.सही शब्द दिये.

श्यामल सुमन said...

बहुत खूब।

जख्मे जिगर हमारा भरने लगा था शायद।
नस्तर बतौर तोहफा उसने थमा दिया।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही सटीक. धन्यवाद.

hempandey said...

'पराए तो पराए ही थे
अब न रहे अपने भी मेरे '
- दर्द की सजीव अभिव्यक्ति.

Shikha Deepak said...

दर्द को बड़े सलीके से अभिव्यक्त किया है आपने........सुंदर रचना।

Harkirat Haqeer said...

न कोई फूल दमन में
पराये तो पराये ही थे
अब न रहे अपने भी मेरे
चलते थे जो साथ हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने....

अरे......! ऐसी क्या बात हो गयी मोहन जी.....??

mehek said...

bahut gehre jazbat nikle hai kalam se,dard ki paribhasha di ko chu gayi,bahut achhi rachana.

अनिल कान्त : said...

shabdon mein achchha bayan kiya hai dard

विनय said...

अति सुन्दर रचना...


---
तख़लीक़-ए-नज़रचाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलेंतकनीक दृष्टा

डॉ .अनुराग said...

इन दिनों कागज कुछ गमजदा हो रहा है......अगली बार कुछ हंसी बिखेरिये

mark rai said...

चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने .......
shaayad jindagi ka yahi matlab hi hai ...aadat daal leni chaahiye..shukun milega..

दर्पण साह "दर्शन" said...

paray to paray hi the...
..par na rahe apne bhi mere...

satya hai ji !!

शोभना चौरे said...

दर्द ही तो जीवन मे आगे बढ़ने की शक्ति देता है मोहनजी |
फ़र्क इतना है दूसरे दर्द देते है तो टीस न्ही होती अपने दर्द देते है तो टीस
अपना घर कर लेती है |

Babli said...

बहुत बहुत धन्यवाद आपके सुंदर कमेंट्स के लिए और ख़ूबसूरत पंक्तियों के लिए!
बहुत ही बढ़िया लगा ! ज़िन्दगी में सिर्फ़ सुख नहीं होता बल्कि दुःख और दर्द का वक्त भी आता है सही फ़रमाया मोहन जी आपने!

Mumukshh Ki Rachanain said...

चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने

दर्द को बड़े सलीके से अभिव्यक्त किया है आपने........सुंदर रचना।

सादर

चन्द्र मोहन गुप्त

seema gupta said...

चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने
किसी के साथ न होने ka दुःख या किसी के खोने का दुःख......भावनात्मक पंक्तियाँ....

regards

अल्पना वर्मा said...

चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने
किसी के साथ न होने

sorry ..der se pahunchi hun...

aaj to yah kavita aap ne maayusi ke dhogon mein bati hai..

khaireeyat??
kavita khair hoti hi aisee hai ki kavi ke har bhaav ko khud mein samo kar us ke dil ko halka kar de.

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

इसमें कोई शक नही की ऐसा होता है ..पर इसमें भी कोई शक नही की वक्त बदलते देर नही लगती

Reecha Sharma said...

very good dost bahut achcha likha hai

sandhyagupta said...

Achchi lahi aapki kavita.Badhai.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह मोहन जी अच्छी कविता के लिये बधाई.....