Saturday, 28 March 2009

मैं बेरोजगार हूं मुझे नौकरी दे दो


डूबते हुए आदमी ने
पुल पर चलते हुए आदमी को
आवाज लगाई बचाओ बचाओ
पुल पर चलते आदमी ने नीचे
रस्‍सी फेंकी और कहा आओ

नदी में डूबता हुआ आदमी
रस्‍सी नहीं पकड पा रहा था
रह रह कर चिल्‍ला रहा था
मैं मरना नहीं चाहता
जिंदगी बहुत महंगी है
कल ही मेरी एमएनसी में नौकरी लगी है

इतना सुनते ही पुल पर चलते
उस आदमी ने अपनी रस्‍सी खींच ली
और भागता भागता एमएनसी गया
उसने वहां के एचआर को बताया कि
अभी अभी एक आदमी डूबकर मर गया है
और इस तरह आपकी कंपनी में
एक जगह खाली कर गया है

मैं बेरोजगार हूं मुझे नौकरी दे दो
एचआर बोला दोस्‍त
तुमने आने में थोडी देर कर दी
अब से कुछ देर पहले ही
इस नौकरी पर उस आदमी को लगाया है
जो उस आदमी को धक्‍का देकर
पहले यहां आया है

कुछ दिन पहले मेरे एक दोस्‍त की मेल आई मेल पढी तो लगा कि हां यह अपने ब्‍लाग पर सांझा किया जा सकता है और पेश कर दी आपकी खिदमत में


16 comments:

अनिल कान्त : said...

ये किसी और ब्लॉग पर भी पढ़ी है पहले ...पुनः पढ़कर अच्छी लगी

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

hempandey said...

यह एस एम एस आज की सच्चाई बयान करता है. धक्का दे कर आगे बढ़ना आम हो गया है.

mehek said...

अब से कुछ देर पहले ही
इस नौकरी पर उस आदमी को लगाया है
जो उस आदमी को धक्‍का देकर
पहले यहां आया है
mazedar:)

रंजना said...

paina vyangy....

Kya kaha jaay....yah sirf vyangy nahi,aaj ki sthiti sachmuch bahut had tak aisi hi hai.

आलोक सिंह said...

"तुमने आने में थोडी देर कर दी
अब से कुछ देर पहले ही
इस नौकरी पर उस आदमी को लगाया है
जो उस आदमी को धक्‍का देकर
पहले यहां आया है"
बहुत खूब जिसने भी लिखा पर , हमें तो आपने पढ़वाया इसलिए धन्यवाद .

P.N. Subramanian said...

हमने भी कहीं पढ़ी थी. लेकिन दुबारापढने का मौका मिल गया. आभार.

कुमार संभव said...

क्या बात है......... ये सिर्फ कहानी नहीं आज की sacchai है. दुःख होता देश के halat को देख कर....

राज भाटिय़ा said...

राम राम क्या कल यूग आ गया.. शुक्र धक्का देने के लिये लाइन नही लगी थी

संगीता पुरी said...

गलत नहीं लिखा गया है ... आज के युग की सच्‍चाई है यह।

अल्पना वर्मा said...

ek kadawi sachchayee ko batati hui kavita hai.thanks for sharing it.

[Mohan ji aap ke blog par post par only black page nazar aata hai. ya phir red/orange mein likhey words.

post ka matter bilkul dikhayee nahin deta.
aap ke page ki feed par jaa kar yah kavita padhi hai..aur bad mein comment likha hai.

maluum nahin baki sab kaise padh rahey hain?Ya sirf mujhey yah problem dikh rahi hai.

सुशील कुमार said...

पहली बार आया हूं यहाँ। कविता मन को कुरेदती है। बहुत खूबसूरत ब्लॉग बनाया है भाई जी। यह मोती कैसे झर रहे हैं आपके ब्लाग पर मुझे भी बताना। मैं भी लगाना चाहता हूँ। मेरे एमेल पते पर आईडिया देना भाई। मेरा पता है- sk.dumka@ gmail.com
( www.sushilkumar.net)
( diary.sushilkumar.net)

Ketan Kanaujia said...

vashishtha sahab.. layoff ke zamane mein yahi reet reh gayi hai duniya ki.. :)

Science Bloggers Association said...

इस सुंदर सी कविता को हमारे साथ साझा करने के लिए आभार।

बिटिया के जन्‍मदिन की ढेर सारी शुभकामनाऍं।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

अल्पना वर्मा said...

Mohan ji aap ki bitiya ka aaj janamdin hai..
dher sari badhaayeeyan aur sneh us ko hamari taraf se dijeeyega.
ek extra cake piece bhi meri tarf se khila dijeeyega.

sorry thoda der se net par aayi hun.is liye abhi wishes de paa rahi hun.
lekin shubhkamnyen to hamesha saath hain.
thanks

vijaymaudgill said...

बहुत ख़ूब दोस्त। अरे दोस्त जैसे रिसैशन चल रहा उस समय दौरान यह कविता ख़ूब पढ़ाई। अच्छा लगा।

vandana said...

kya khoob tasveer pesh ki hai aapne aaj ki sachchayi ki.