कविता खो गई
मेरी अपनी
जिसे लिखा था मैंने
बहुत ही निराले अंदाज में
खो गई कहीं
कहां ढूंढूं
कहां खोजूं
किस किताब में दबी होगी
किताब में होगी भी, या नहीं
कहीं
मेरे भीतर ही तो नहीं खो गई
पता नहीं
क्या सच में मुझसे खो गई
या आंख मिचौली खेल रही है
पता नहीं
क्यों नहीं मिल रही मुझे
मेरी कविता
Monday, 29 June 2009
Tuesday, 2 June 2009
बेटियां
बहुत दिनों बाद आज आना हो पाया है आप सभी के बीच। ये 20-25 दिन बहुत भारी बीते और आप सभी को तो बहुत ही याद किया। हर रोज ख्याल आता था कि आज कौन सी पोस्ट और कौन सी कविता आई होगी किसने किसकी पोस्ट उठा कर अपने ब्लाग पर पोस्ट की होगी किसी ने मेरा ब्लाग खोला होगा आदि आदि। दरअसल पिछले दिनों में मेरी बिटिया जो अभी पांचवे साल में चल रही है और उसे डायरिया होने की वजह से अस्पताल में 7-8 दिन तक रहना पडा इस कारण आप सभी से अचानक दूरी बना दी इस डायरिया ने। लेकिन अब वह बिल्कुल ठीक है। इस कारण से 8-10 दिन की दूरी हो गई। फिर एक आफत आ गई हमारे इंटरनेट साहब जी को उनको भी लू लग गई और वो भी छुटटी लेकर चले गए और बना गए आपसे हमारी दूरी कुछ दिन के लिए अब दो दिन पहले ही इंटरनेट साहब पधारे हैं ठीक होकर तो सोचा चलो अब आप सभी के हालचाल पूछ ही लेते हैं। इन दिनों हम अपने बलाग का जन्मदिन भी नहीं मना पाए। क्योंकि 15 तारीख को ही हमारे इस ब्लाग का जन्म हुआ था। अब आप सभी के बीच में आने का मन बना लिया तो नया तो कुछ नहीं बस एक छोटी सी कोशिश की है लिखने की वो आप सभी बताएंगे कि कोशिश कैसी रही। यह कविता मैं अपनी बिटिया को डैडिकेट कर रहा हूं तो आप पढें और बताएं
बेटियां कितनी जल्दी बडी हो जाती हैं
इस बात का पता शायद ही
किसी मां बाप को ना चले
दिन निकल जाते हैं यों ही
अभी कुछ दिन पहले ही तो
उसने चलना शुरू किया था
आज दौडने भी लग गई
अभी कुछ दिन पहले तक तो
ठीक से बोल भी नहीं पाती थी
लेकिन आज गाना गाने लगी
आज जन्मदिन है उसका चौथा
पांचवा भी करीब है
और यूं ही देखते देखते
हो जाएगी बडी
और फिर
उड जाएगी छोडकर पिता का घर
बेटियां कितनी जल्दी बडी हो जाती हैं
इस बात का पता शायद ही
किसी मां बाप को ना चले
दिन निकल जाते हैं यों ही
अभी कुछ दिन पहले ही तो
उसने चलना शुरू किया था
आज दौडने भी लग गई
अभी कुछ दिन पहले तक तो
ठीक से बोल भी नहीं पाती थी
लेकिन आज गाना गाने लगी
आज जन्मदिन है उसका चौथा
पांचवा भी करीब है
और यूं ही देखते देखते
हो जाएगी बडी
और फिर
उड जाएगी छोडकर पिता का घर
Monday, 11 May 2009
प्यार हो तो ऐसा
एक लड़का और एक लड़की..
एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे |
लड़के की मौत के बाद,
उसने लड़की को याद करते हुए कहा..
"एक वादा था तेरा, हर वादे के पीछे..
तुम मिलोगी मुझे हर दरवाजे के पीछे..!
पर तुम मुझसे दगा कर गई..
एक तुम ही न थी मेरे जनाजे के पीछे..!"
पीछेसे एक आवाज आई..
तब लडकेने मुडके देखा, तो वही लड़की खड़ी थी |
लड़कीने कहा..
"एक वादा था मेरा, हर वादे के पीछे..!
मैं मिलूंगी तुम्हे हर दरवाजे के पीछे..!
पर तुमने मुडकर नहीं देखा..
एक और जनाजा निकला था, तेरे जनाजे के पीछे..!"
प्रिय साथियों कुछ दिन पहले मुझे मेरे एक दोस्त ने दिल्ली से एक मेल भेजी जिस में ये कुछ लाईनों की रचना थी पढा तो दिल को छू गई। आज दोबारा से पढा तो सोचा क्यों ना अपने बलाग की शोभा बनाई जाए। यहां पर मैं यह भी बता दूं कि यह रचना मैंने नहीं लिखी है। लेकिन इसके लेखक का नाम भी मुझे नहीं पता है हां यह पता है कि इसे भेजने वाला दोस्त दिल्ली में हैं। तो इस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। अगर किसी को कोई ऐतराज हो तो मुझे बता सकता है। उसके बाद मैं इसे डिलीट कर दूंगा या महान ब्लागर्स जो भी राय देंगे वह मैं मानूंगा लेकिन मेरा किसी की भी पोस्ट को चोरी करने का कोई इरादा नहीं है इसलिए पढें और बताएं कि क्या ये गलत तो नहीं है
एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे |
लड़के की मौत के बाद,
उसने लड़की को याद करते हुए कहा..
"एक वादा था तेरा, हर वादे के पीछे..
तुम मिलोगी मुझे हर दरवाजे के पीछे..!
पर तुम मुझसे दगा कर गई..
एक तुम ही न थी मेरे जनाजे के पीछे..!"
पीछेसे एक आवाज आई..
तब लडकेने मुडके देखा, तो वही लड़की खड़ी थी |
लड़कीने कहा..
"एक वादा था मेरा, हर वादे के पीछे..!
मैं मिलूंगी तुम्हे हर दरवाजे के पीछे..!
पर तुमने मुडकर नहीं देखा..
एक और जनाजा निकला था, तेरे जनाजे के पीछे..!"
प्रिय साथियों कुछ दिन पहले मुझे मेरे एक दोस्त ने दिल्ली से एक मेल भेजी जिस में ये कुछ लाईनों की रचना थी पढा तो दिल को छू गई। आज दोबारा से पढा तो सोचा क्यों ना अपने बलाग की शोभा बनाई जाए। यहां पर मैं यह भी बता दूं कि यह रचना मैंने नहीं लिखी है। लेकिन इसके लेखक का नाम भी मुझे नहीं पता है हां यह पता है कि इसे भेजने वाला दोस्त दिल्ली में हैं। तो इस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। अगर किसी को कोई ऐतराज हो तो मुझे बता सकता है। उसके बाद मैं इसे डिलीट कर दूंगा या महान ब्लागर्स जो भी राय देंगे वह मैं मानूंगा लेकिन मेरा किसी की भी पोस्ट को चोरी करने का कोई इरादा नहीं है इसलिए पढें और बताएं कि क्या ये गलत तो नहीं है
Wednesday, 6 May 2009
बेटियां
जब बेटी के होने पर खुशी मनती थी
आजकल क्या हुआ इस दुनिया को
कहां गई वो सुशील सुनैयना
और
वो घर की लक्ष्मी कहलाने वाली
आखिर क्या कसूर है इनका
जो इनको इस जहां में आने से
पहले ही भेज दिया जाता है
दूसरे जहां की ओर
जो आज मां है
कल वो भी किसी की बेटी थी
आज जो पत्नि है
वह भी किसी की बेटी थी
आने दो इस बेटी को
मत छीनो इससे जिंदगी इसकी
एक दिन यही बेटी
पूरी दुनिया की बेटी बनेगी
अपनी मेहनत से
अपनी लगन से
तुम्हारा और देश का
नाम रोशन करेगी
आने दो, आने दो
इस बेटी को आने दो
आजकल क्या हुआ इस दुनिया को
कहां गई वो सुशील सुनैयना
और
वो घर की लक्ष्मी कहलाने वाली
आखिर क्या कसूर है इनका
जो इनको इस जहां में आने से
पहले ही भेज दिया जाता है
दूसरे जहां की ओर
जो आज मां है
कल वो भी किसी की बेटी थी
आज जो पत्नि है
वह भी किसी की बेटी थी
आने दो इस बेटी को
मत छीनो इससे जिंदगी इसकी
एक दिन यही बेटी
पूरी दुनिया की बेटी बनेगी
अपनी मेहनत से
अपनी लगन से
तुम्हारा और देश का
नाम रोशन करेगी
आने दो, आने दो
इस बेटी को आने दो
Friday, 24 April 2009
न कोई फूल दामन में मेरे
वक्त के कर्कश थपेडों ने
खडा कर दिया आज मुझे
उस मोड पर
जहां से
पीछे हटने का नहीं है हौसला मुझमें
आगे बढने की ताकत नहीं मुझमें
ये एक मोड जिंदगी का मेरे
है खतरनाक
चंद कांटे ही कांटे हैं
न कोई फूल दामन में मेरे
पराए तो पराए ही थे
अब न रहे अपने भी मेरे
चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने
खडा कर दिया आज मुझे
उस मोड पर
जहां से
पीछे हटने का नहीं है हौसला मुझमें
आगे बढने की ताकत नहीं मुझमें
ये एक मोड जिंदगी का मेरे
है खतरनाक
चंद कांटे ही कांटे हैं
न कोई फूल दामन में मेरे
पराए तो पराए ही थे
अब न रहे अपने भी मेरे
चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने
Sunday, 19 April 2009
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
कितने ही अफसाने कहते हो
होता है मीठा सा अहसास
उन तानों में भी जो तुम देते हो
विरह वेदना से हो पीडित
याद मुझे तुम करते हो
जब भी ताने तुम देते थे
अब भी ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
क्या तुम्हें नहीं पता दूरी बढाती है प्यार
विरहनी बनी थी मीरा
राधा ने भी रस चखा
चखकर तुम भी रस विरह का
ताने हजार देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
इस विरह में तुम्हारे
दिन तो गुजर जाता है
आते आते शाम और फिर रात के
ये दिल पगला सा जाता है
और कोसता हूं इस विरह को मैं भी
जिसमें ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
कितने ही अफसाने कहते हो
होता है मीठा सा अहसास
उन तानों में भी जो तुम देते हो
विरह वेदना से हो पीडित
याद मुझे तुम करते हो
जब भी ताने तुम देते थे
अब भी ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
क्या तुम्हें नहीं पता दूरी बढाती है प्यार
विरहनी बनी थी मीरा
राधा ने भी रस चखा
चखकर तुम भी रस विरह का
ताने हजार देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
इस विरह में तुम्हारे
दिन तो गुजर जाता है
आते आते शाम और फिर रात के
ये दिल पगला सा जाता है
और कोसता हूं इस विरह को मैं भी
जिसमें ताने तुम देते हो
हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो
Tuesday, 14 April 2009
मैं कवि बनता नहीं
खाली कागज पर
नीली स्याही वाले पैन से
चंद आडी तिरक्षि लकीरें
खींचने से
कोई कविता नहीं बनती
न ही कोई
कवि बन जाता ऐसे ही
कवि बनने के लिए
अपना दिल बाहर निकाल
खून से उस पर लिखना
आंसुओं से उसको सींचना
और फिर
मन के किसी कोने से
दिमाग के किसी हिस्से से
डालना होता है
थोडा आत्मविश्वास उस पर
रचने पडते हैं संवाद
यूं ही कोई भावनाओं में बहकर
कवि नहीं बन जाता
कब से समझा रहा हूं अपने आप को
मगर दिल सुनता नहीं
मन किसी की मानता नहीं
दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं
नीली स्याही वाले पैन से
चंद आडी तिरक्षि लकीरें
खींचने से
कोई कविता नहीं बनती
न ही कोई
कवि बन जाता ऐसे ही
कवि बनने के लिए
अपना दिल बाहर निकाल
खून से उस पर लिखना
आंसुओं से उसको सींचना
और फिर
मन के किसी कोने से
दिमाग के किसी हिस्से से
डालना होता है
थोडा आत्मविश्वास उस पर
रचने पडते हैं संवाद
यूं ही कोई भावनाओं में बहकर
कवि नहीं बन जाता
कब से समझा रहा हूं अपने आप को
मगर दिल सुनता नहीं
मन किसी की मानता नहीं
दिमाग काम करता नहीं
और मैं कवि बनता नहीं
Thursday, 9 April 2009
घर तो घर था
घर तो घर था
घर हुआ करता था
भाई बहन मां बाप
सब के रहने से
घर बना हुआ था
घर धीरे धीरे बनता गया मकान
मकान में कुछ लोगों के रहने से
मकान मकान ही रहा
न बन सका घर
घर हुआ करता था
भाई बहन मां बाप
सब के रहने से
घर बना हुआ था
घर धीरे धीरे बनता गया मकान
मकान में कुछ लोगों के रहने से
मकान मकान ही रहा
न बन सका घर
बीत गए बरसों
Wednesday, 8 April 2009
माएं नी माएं मैं इक शिकरा यार बनाया
नमस्कार साथियों आज मुझे मेरे एक दोस्त ने शिव कुमार बटालवी की आवाज का जादू का लिंक चंडीगढ से भेजा सुना तो दिल बाग बाग हो गया और सोचा कि क्यों ना आपको भी इस जादू को सुनाकर व दिखाकर मोहित कर लिया जाए तो पेश है आप सबकी खिदमत में शिव कुमार बटालवी की माए नी माए मैं एक शिकरा यार बनाया
सुनिए और फिर बताइये कैसा लगा आपको यह गीत


सुनिए और फिर बताइये कैसा लगा आपको यह गीत

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