कविता खो गई
मेरी अपनी
जिसे लिखा था मैंने
बहुत ही निराले अंदाज में
खो गई कहीं
कहां ढूंढूं
कहां खोजूं
किस किताब में दबी होगी
किताब में होगी भी, या नहीं
कहीं
मेरे भीतर ही तो नहीं खो गई
पता नहीं
क्या सच में मुझसे खो गई
या आंख मिचौली खेल रही है
पता नहीं
क्यों नहीं मिल रही मुझे
मेरी कविता
