Thursday, 9 April 2009

बीत गए बरसों




आज
कल
परसों
बीत गए बरसों
उनसे मिले हुए
जो अक्‍सर कहते थे
चलेंगे साथ उम्रभर
यूं ही डालकर
इक दूजे के
हाथों में हाथ

Wednesday, 8 April 2009

माएं नी माएं मैं इक शिकरा यार बनाया

नमस्कार साथियों आज मुझे मेरे एक दोस् ने शिव कुमार बटालवी की आवाज का जादू का लिंक चंडीगढ से भेजा सुना तो दिल बाग बाग हो गया और सोचा कि क्यों ना आपको भी इस जादू को सुनाकर दिखाकर मोहित कर लिया जाए तो पेश है आप सबकी खिदमत में शिव कुमार बटालवी की माए नी माए मैं एक शिकरा यार बनाया

सुनिए और फिर बताइये कैसा लगा आपको यह गीत



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Sunday, 5 April 2009

मेरे अपने बारे में

जब भी मैं सोचता हूं अपने बारे में
कि मैं क्‍या हूं
अंदर झांकता हूं
तो पाता हूं
कुछ भी नहीं मैं

कभी सोचता हूं कि
किसी कवि की लिखी
किसी कविता के
शब्‍द में लगी मात्रा की आवाज का
सौंवा भाग भी नहीं हूं

कभी सोचता हूं कि
धरा पर लगे वृक्षों के पत्‍ते पर पडी
ओस की बूंद का
सौवां भाग भी नहीं हूं

कभी सोचता हूं कि
रिमझिम गिरती बारिश की एक बूंद
जो बादलों से गिरकर बिखर गई
उसके छोटे से भाग के समान भी नहीं हूं

तब मैं सोचता हूं कि
लोग क्‍यों कहते हैं कि
तुम ये हो तुम वो हो
क्‍या लोग सही हैं
यदि हैं तो मुझे क्‍यों नहीं दिखता
क्‍यों नहीं महसूस होता
क्‍यों नहीं सोच पाता कि
हां मैं हूं
मैं हूं बहुत कुछ

Wednesday, 1 April 2009

बिसरी यादें मूर्ख दिवस की

बात आज से ठीक पांच साल पहले की है। मेरी शादी के ठीक 20 दिन बाद मूर्ख दिवस यानी आज का दिन आ जाता है। हांलांकि कभी इस दिवस को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन उस बार जो मूर्ख बनाया कि आज तक इस बात को याद कर मेरी श्रीमती जी अभी भी हंसते हंसते लोट पोट हो जाती है। हुआ यूं कि 1 अप्रेल को मैंने सुबह सुबह बोल दिया कि चलो आज दीदी के घर चलते हैं। दीदी मेरे घर से करीब 35 किलोमीटर दूर हैं। तो श्रीमती जी बहुत खुश हो गईं। और थैंक्‍यू कहते हुए तैयार होने के लिए चली गई। बाद में उन्‍हें ऐसा आभास हुआ कि कहीं कुछ गडबड है तो उन्‍होंने सोचा कि ये कभी कोई काम घरवालों से बिना पूछे नहीं करते तो क्‍यों ना घरवालों से खासकर मम्‍मी से पूछ लेती हूं। वह तुरंत मम्‍मी के पास जाकर बोली कि क्‍या हम सच में ही जा रहे हैं। मम्‍मी ने बोला कहां जा रहे हो। तो मम्‍मी बोली कि मुझे तो पता नहीं। अब यह बात मैंने बाकी तो सब से कर ली थी लेकिन मम्‍मी से नहीं कर पाया। बीच में आकर बडे भईया बोले कि हां मेरे से बोल रहा था चले जाओ लेकिन शाम को जल्‍दी आ जाना। अब श्रीमती के पैर तो आसमान में। क्‍योंकि दीदी से बहुत पटती है उसकी और दीदी भी कई बार बोल चुकी थी सो बहुत खुश थी। अब बोलने लगी मैं क्‍या पहन कर चलूं तो मैंने कहा कि कोई अच्‍छी सी साडी पहन लो लंगहा चुन्‍नी पहन लो तो खुद ही बीच में बोल उठीं कि लांचा पहन लूं। मैंने कहा कि यार नहीं लांचा नहीं। तो उन्‍होंने मम्‍मी से जाकर सिफारिश लगा दी। और मम्‍मी ने बोल दिया तो मेरी क्‍या मजाल कि मैं मना कर दूं। तैयार हुए अच्‍छे से एक डेढ घंटा लगाकर। फिर घर से चले और जाकर सडक वाले पुराने घर पर बिठा दिया। बोली क्‍या हुआ। मैंने कहा हो गया अप्रेल फूल।
पहले तो काफी देर तक वह रोती रही फिर मेरे से घर ना जाने की जिद करने लगी बोली कि अब मैं शाम होने से पहले घर नहीं जाऊंगी। अभी कुछ खाया भी नहीं था बेचारी मूर्ख बनायी सो लभाब में। अब मूर्ख बनाया हे तो मूर्ख को निभाना भी हमें ही है। फिर उनके लिए खाने पीने का इंतजाम किया और वहीं दोपहर में पुराने घर में सो गए। हुई शाम तो उन्‍हें लेकर घर गए। घर पर हंसी खुशी का माहौल देखते ही बनता था। उस दिन वो अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली किसी के सामने। सच में बहुत ही अच्‍छा खुशी भरा दिन था वो यादगार दिन। लेकिन अब शायद पता नहीं कब ऐसा दिन आएगा।

Saturday, 28 March 2009

मैं बेरोजगार हूं मुझे नौकरी दे दो


डूबते हुए आदमी ने
पुल पर चलते हुए आदमी को
आवाज लगाई बचाओ बचाओ
पुल पर चलते आदमी ने नीचे
रस्‍सी फेंकी और कहा आओ

नदी में डूबता हुआ आदमी
रस्‍सी नहीं पकड पा रहा था
रह रह कर चिल्‍ला रहा था
मैं मरना नहीं चाहता
जिंदगी बहुत महंगी है
कल ही मेरी एमएनसी में नौकरी लगी है

इतना सुनते ही पुल पर चलते
उस आदमी ने अपनी रस्‍सी खींच ली
और भागता भागता एमएनसी गया
उसने वहां के एचआर को बताया कि
अभी अभी एक आदमी डूबकर मर गया है
और इस तरह आपकी कंपनी में
एक जगह खाली कर गया है

मैं बेरोजगार हूं मुझे नौकरी दे दो
एचआर बोला दोस्‍त
तुमने आने में थोडी देर कर दी
अब से कुछ देर पहले ही
इस नौकरी पर उस आदमी को लगाया है
जो उस आदमी को धक्‍का देकर
पहले यहां आया है

कुछ दिन पहले मेरे एक दोस्‍त की मेल आई मेल पढी तो लगा कि हां यह अपने ब्‍लाग पर सांझा किया जा सकता है और पेश कर दी आपकी खिदमत में


Wednesday, 25 March 2009

मंजिल की विसात ही क्‍या

मंजिल ही रही अब कोई
रास्ता भी मैं भटक गया
सोचा था साथ दे देंगे मेरे कदम
चलेंगे मेरे साथ दूर तलक
मिल जाएगी मंजिल
होगी आसान डगर
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या

अब अपनों ने मुंह फेर लिया
दुनिया का भरोसा क्या करना
जब दोस् ही दुश्मन बन गए
तो गैरों की बात ही क्या करना
किससे कहना किसको सुनना
है तकदीर का ये फसाना
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्या

की थी कोशिश पकड उंगली चलने की
चला था कुछ दूर साथ उनके
छोड बीच राह में अकेले
चले गए मेरी उंगली थामने वाले
जब उंगली ने ही साथ छोड दिया
तो थामने वालों की बात ही क्या
कदम ही मेरा साथ छोड गए
तो मंजिल की विसात ही क्‍या

Saturday, 21 March 2009

बताओ तो जानें

नमस्‍कार दोस्‍तों
माफ करना अभी आप सबको झिलाने का मूड नहीं बन पा रहा है। इसलिए अभी शांत ही बैठा हूं कुछ भी नहीं लिख रहा हूं बस पढने में व्‍यस्‍त हूं। आज अचानक ही बैठा था तो सोचा कि सबको यह भी बता देना बहुत जरूरी है कि मैं ब्‍लाग जगत में जीवित हूं। और नारद मुनि की तरह भ्रमण करता रहता हूं।

आज मुझे आप सभी की बहुत जरूरत आन पडी है। और मुझे यह भी पूरा यकीन है कि आप मेरी हरसंभव मदद करने को सदैव तत्‍पर होंगे। और आखिर होंगे भी क्‍यों ना सबको कुछ ना कुछ लिखकर हमेशा झिलाता रहता हूं। अब शायद कुछ लोग झिलाना शब्‍द को नहीं समझ सकें होंगे तो मैं खुद ही बता दूं कि झिलाना मतलब परेशान करना, सिर दर्द करना जैसे कहते हैं कि एक शेर अर्ज किया है अब इसे झेलो तो वही झिलाना हूं मैं

तो अब काम की बात की जाए
तो काम की बात यह है कि मुझे एक भजन जोकि श्रीकृष्‍ण के ऊपर बनाया गया है और में इसकी मूल सीडी उपलब्‍ध हो सकती है । यह भजन मैंने सन 2005 में सुना था। अगर किसी के पास सीडी हो या ये भजन हो तो कृप्‍या मुझे मेरे मेल आईडी जोकि मेरी प्रोफाइल में है पर बता दें साथ ही अपना नंबर भी दे दें ।
इस भजन में
कृष्‍ण मात यशोदा से अपने ब्‍याह की अर्ज करते हुए अपने लिए बटुआ सी बहू लाने की बात कहते हैं
अब आप सभी से यह मेरी अरदास है कि इस सीडी के बारे में कृप्‍या मुझे जरूर बताएं या फिर ये वाला भजन मुझे मेल कर दें आप सबकी मदद की दरकार है मुझे इस समय।



इसी बहाने आपसे सिर्फ एक छोटा सा सवाल पूछ रहा हूं शायद कईयों को पता भी होगा लेकिन बताना जरूर

एक बार एक मुर्गी अपने तीन चूजों के साथ सडक पार कर रही थी। सडक पार करते समय कार सामने आ गई और मुर्गी एक चूजे के साथ तो पार हो गई। बाकी चूजे पीछे ही रह गए। बाद में दोनों चूजे भी सडक पार आ गए। मुर्गी अपनी गिनती करने लगी और बोली ठीक है हम चारों बिल्‍कुल सुरक्षित है तो तुरंत ही सबसे छोटा चूजा भी बोल पडा वाह हम पांचों बि‍ल्‍कुल ठीक हैं और सडक पार कर चुके हैं अब आप बताओ कि ये पांचवा चूजा कहां से आया। बताओ बताओ लेकिन याद रखें चीटिंग नहीं चलेगी

Tuesday, 10 March 2009

पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

होली का पर्व रंगों का त्‍योहार है। यह हमारी संस्‍कृति और विरासत का एक संभाला हुआ त्‍योहार है। इसे आप चाहो तो आपसी प्‍यार से संभाल सकते हो और चाहो तो खो सकते हो एक दूसरे की दुश्‍मनी में । ये अब आप सब के हाथ में है। तो इस रंगीन मिजाज होली का जमकर लुत्‍फ उठाओ और सभी को गले लगाकर रंग लगाना ना भूलना


होली के पावन पर्व की आपको परिवार सहित हार्दिक शुभकामनाएं

भगवान करे ये होली सबके जीवन में एक नई बहार नया जोश और रंगों से लबारेज हो

Friday, 6 March 2009

जिंदगी में भरो रंग
















पहले जब होली आती थी
खूब मस्तियां होती थी
जमीन भी गीली
आसमान भी गीला
होता सारा जहां रंगीला


दिन चार पहले हो
ली के
सजते थे बाजार रंगों के
बच्‍चे पिचकारी चुनते थे
फिर भर रंग गुब्‍बारे फैंकते थे
रूकने पर राहगीर के
घर में छिपते फिरते थे




आता जैसे दिन फाग का

होता आसमान रंगों का
ढोल नगाडे बजते थे
हुर्रारे नाचते फिरते थे
घर-घर जाकर
पुआ-पकौडे खाते थे
कहीं पर मिलती बूंटी भोले की
मस्‍त होकर पीते थे

अब होली कहां रही रंगों की
दुश्‍मन हो गए भाई-भाई
रह गई होली खून की
लगा दिया गर रंग किसी को
गाली सुनने को मिलती है
अब गले लगाने की जगह
बंदूक गले पड जाती है
होली मनाने की जगह
अब गोली चलाई जाती है


अब कहां गया वो दौर होली का
कहां खो गए रंग गुलाल
कहां से आ गई शराब बीच में
रंग में भंग डालने को
मत भूलो तुम हो भारतवंशी
दी थी होली श्रीकृष्‍ण ने
खेली थी वृंदावन में
कहो तुम उस देश के वासी हो



होली आई है होली मना
रंग गुलाल सभी को लगाओ
सब को अपने गले लगाओ
शराब, जुआ और बं
दूके
इन सबको दूर भगाओ



(पकौडे खिलाओ होली मनाओ........... टिंग टिंग टिडिंग)

सभी फोटो साभार गूगल


Wednesday, 4 March 2009

योगेन्‍द्र मौदगिल जी की किताब की समीक्षा

दिन 22 फरवरी 2009 के रविवार के दैनिक भास्‍कर के अंक में रसरंग मैग्‍जीन में छपी योगेन्‍द्र मौ‍दगिल जी की किताब अंधी आंखें गीले सपने की समीक्षा पढी। पढकर बहुत ही अच्‍छा लगा। ज्ञात हो कि श्री मौ‍दगिल अपने कई ब्‍लाग भी चलाते हैं। कवि योगेन्‍द्र मौदगिल इनका बहुत ही च‍र्चित ब्‍लाग है। इतना बडा लेखक बहुत ही सहज अपनी बात कह जाता है। यह समीक्षा पंजाब के जाने माने लेखक श्रीमान मनिदंर सिंह कांग ने की।


(फोटो पर क्लिक कर व्‍यू बडा कर सकते हैं)
श्री कांग ने मौदगिल साहब के काम की काफी सराहना की और उनकी पीठ थपथपाई। श्री कांग भी पंजाब के जाने माने गजलकार हैं। अब ज्‍यादा तो मैं क्‍या कहूं आप खुद ही पढ लो श्री मौदगिल साहब की समीक्षा। क्‍योंकि मेरे पास शब्‍दों का भंडार नाममात्र भी नहीं है। तो मैं कैसे उनकी समीक्षा कर सकता हूं।


मौदगिल साहब हरियाणा के हास्य-व्यंग्य कवि एवं गज़लकार हैं। उनकी कविता की 6 मौलिक एवं 10 संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्‍होंने भारत भर में अनेक मंचीय काव्य यात्राएं की हैं। अनेक सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों व क्लबों से सम्मानित किए जा चुके हैं, उनमें 2001 में गढ़गंगा शिखर सम्मान, 2002 में कलमवीर सम्मान, 2004 में करील सम्मान, 2006 में युगीन सम्मान, 2007 में उदयभानु हंस कविता सम्मान और 2007 में ही पानीपत रत्न के सम्‍मान से नवाजा जा चुका है। सब टीवी, जीटीवी, ईटीवी, एमएचवन, चैनल वन, इरा चैनल, इटीसी, जैनटीवी, साधना, नैशनल चैनल आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से नियमित कवितापाठ करते आ रहे हैं। हरियाणा की एकमात्र काव्यपत्रिका कलमदंश का पिछले 6 वर्षों से निरन्तर प्रकाशान व संपादन करते आ रहे हैं। दैनिक भास्कर में 2000 में हरियाणा संस्करण में दैनिक काव्य स्तम्भ तरकश का लेखन। दैनिक जागरण में 2007 में हरियाणा संस्करण में दैनिक काव्य स्तम्भ मजे मजे म्हं का लेखन। अब तक पानीपत, करनाल एवं आसपास के जिलों अपितु राज्‍यों में 50 से अधिक अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों के सफल संयोजन में भी मौदगिल साहब की सहभागिता रही