Saturday, 15 November 2008

टूट गया याराना

आज प्‍यार से प्‍यार का टूट गया याराना
आया है याद वो गांव का खंडहर पुराना
जहां होती थी हम दोनों की रोज मुलाकातें
कुछ मीठी सी नोंक झोंक और कुछ प्‍यारी सी बातें

वो खंडहर, हमारी अनमोल चाहत का था महल
ना जाने किसकी लगी हमारे प्‍यार को नजर
एक पल में जुदा कर गया वक्‍त मुझसे मेरे यार को
कुछ इस कदर उठा तूफान जमाने की बंदिशों का
कि फना हो गई हमारी मोहब्‍बत की कहानी

रुका तूफान तो निगाहों ने ढूंढा मेरे प्‍यार को
देखा कि वो पुराना खंडहर ढह चुका था
और उसके साथ ही दफन हो गया
वो हमारे प्‍यार का महल

Wednesday, 12 November 2008

मेरा साया

मेरा हमदम मेरा दोस्‍त है मेरा साया
हर समय हर पल
रहता है साथ
मेरा साया

सुख में दुख में
आंधी तूफान में
मेरे साथ है
मेरा साया

कभी थकता नहीं कभी रुकता नहीं
चलता ही जाता है
साथ मेरे
मेरा साया

सूखी नदी में पैर फिसल गया
मुझे संभाला खुद गिर गया
मेरा साया

पर्वत ने रोका रास्‍ता मेरा
न रुकने दिया चलाता रहा मुझे
मेरा साया

दोस्‍तों ने छोड दिया साथ
न होने दिया कभी उदास
हंसता रहा साथ मेरे
मेरा साया

Tuesday, 11 November 2008

मैं क्‍या हूं...

बहुत दिनों से ब्‍लाग से मेरा संपर्क नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे शरीर के किसी अंग ने काम करना ही बंद कर दिया। बहुत तकलीफ होती थी। जब सोचता था कि इतने दिनों तक की जुदाई आखिर कैसे सही है मैंने। बताने के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं। आज कुछ लिखने का काफी मन बन गया और सोचा चाहे आज कुछ भी हो जाए एक पोस्‍ट तो लिखूंगा ही लेकिन जैसे ही मेल चैक की तो उसमें बहुत ही महान ब्‍लागरों की मेल देखी जिसमें लिखा था कि आगे भी बढो। पढकर एकबारगी तो सोचने पर मजबूर हो गया कि ब्‍लाग के पहले मैं क्‍या था और आज महान महान विद्वान मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं और मुझे आगे बढने के लिए कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मेरी खुशी का ठिकाना ही ना रहा क्‍योंकि अब मैं अकेला नहीं हूं। आज ना लिख पाने के लिए क्षमा चाहता हूं लेकिन कल से अवश्‍य इस ब्‍लाग को नियमित कर लूंगा। बस आप सभी का यही आशीर्वाद की कामना करता हूं। बस ये चार लाईने जैसे ही जहन में आई तो इन्‍हीं चार लाईनों को सांझा कर रहा हूं ...

सोचता हूं आज मैं

क्‍या था कुछ दिनों पहले मैं

शायद किसी कवि की रचना

के किसी शब्‍द की मात्रा का

सौंवा भाग भी नहीं हूं मैं

शायद किसी रेगिस्‍तान के

रेत के एक कण के माणिद भी नहीं हूं मैं

कोई बताए मुझे

मैं क्‍या हूं मैं क्‍या हूं मैं क्‍या हूं

Friday, 24 October 2008

हार्दिक शुभकामनाएं

दीपों के पर्व की

बुराई पर सच्‍चाई की

अंधेरे पर उजाले की

और धनलक्ष्‍मी

गणपति

और

विश्‍वकर्मा जी की

असीम कृपा

आप हम और सभी पर बरसे इसी के साथ आप सभी को

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

Sunday, 19 October 2008

हो गया आशिक का सर्वर शट डाऊन....

कल जब मिले थे
तो दिल में हुआ एक साऊंड
और आज मिले तो कहते हैं
यूअर फाईल नोट फाऊंड

जो मुददत से होता आया है
वो रिपीट कर दूंगा
तू नहीं मिली तो अपनी जिंदगी
कंट्रोल आल्‍ट डिलीट कर दूंगा

शायद मेरे प्‍यार को
टेस्‍ट करना भूल गए
दिल से ऐसा कट किया
कि पेस्‍ट करना भूल गए

लाखों होंगे निगाह में
कभी मुझे भी पिक करो
मेरे प्‍यार के आइकन पे
कभी तो डबल क्लिक करो

रोज सुबह हम करते हैं
प्‍यार से उन्‍हें गुड मार्निंग
वो ऐसे घूर के देखते हैं
जैसे जीरो एरर और पांच वार्निंग्‍स

ऐसा भी नहीं है कि
आई डोंट लाईक यूअर फेस
पर दिल के स्‍टोरेज में
नो मोर डिस्‍क स्‍पेस

घर से जब तुम निकले
पहने के रेशमी गाऊन
जाने कितने दिलों का
हो गया सर्वर शट-डाऊन

Tuesday, 30 September 2008

नंगे पैर













नंगे पैर
निर्वस्‍त्र तन
बेकाबू मन
पर
फिर भी
विचर रहा हूं
इस धरा पर
नंगे पैर...






कहने को तो जिंदगी है
लेकिन
जीने के नाम पर
कुछ भी बाकी नहीं है
कर दिया किस्‍मत ने
दाने दाने को मोहताज
फिर भी
विचर रहा हूं
इस धरा पर
नंगे पैर...





अब देखना है जिंदगी में
क्‍या क्‍या खेल हैं मुकद्दर के
कब मिलेगी मुक्ति इस नश्‍वर शरीर से
कोई परवाह नहीं
जो होगा नसीब में इस मुकद्दर के
फिर भी
विचर रहा हूं
इस धरा पर
नंगे पैर...

Saturday, 13 September 2008

ओ मेरे वतन के हत्‍यारों ...



ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...

क्‍या तुम किसी मां के बेटे नहीं
क्‍या तुम किसी मांग के सिंदूर नहीं
क्‍या तुमको किसी राखी की लाज नहीं
क्‍यों करते हो खून खराबा
क्‍या तुमको जनमानस से प्‍यार नहीं
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...

चाहते हो तुम इस मेरे देश में
ना रहे अमन शांति किसी क्षेत्र में
कर लो करना है तुमको जो
होगी शांति होगा मुकाबला
इस वीर वतन मेरे देश में
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...

मत भूलो चंद्रशेखर आजाद भगतसिंह
पैदा हुए थे इसी देश में
चटा दी थी धूल दुश्‍मनों को
इस वीर वतन मेरे देश में
अब बारी है तुम्‍हारी
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...


Friday, 12 September 2008

उदास याद













तुम्‍हारी आने से याद
हो जाता है दिल उदास
अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास

तुम्‍हें क्‍यों करूं मैं याद
क्‍या तुमने दिया मुझे
दुख, दर्द और तकलीफ
क्‍या काफी नहीं है जिंदगी के लिए
अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास


पहले नहीं करता था याद
तो हो जाता था दिल उदास
अब करता हूं तुम्‍हें याद
तो हो जाता हूं और ज्‍यादा उदास
अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास

चलो आज से तुम्‍हें
एक नाम दे दूं
उदास याद
इसमें याद भी है और
याद आने के बाद
मिलने वाली उदासी भी

अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास

Sunday, 7 September 2008

हमारी तुम्‍हारी मुलाकात

हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल
जब मिले थे हम दोनों
पता न था कि
इतना लंबा सफर
तय कर पाएंगे
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल




लद गए दिन मस्‍ती के
छा गया घोर अंधेरा
एक ठोकर लगी
छूट गया साथ तेरा
टूट गया हसीं सपना
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल

अब मेरा अपना ही घर
वीराना सा हो गया
कोई नहीं है साथ में मेरे
ये जहां भी
पराया सा हो गया
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल

अब न तुम हो पास
है केवल तन्‍हाई ही साथ
और वो पल जो
मिले थे मुझे
जब तुम मिले
और कुछ नहीं है पास
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल

Thursday, 7 August 2008

डिप्‍लोमा

एक दिन
मैं दिल्‍ली पहुंचा
स्‍टेशन पर कुली से बाहर जाने का रास्‍ता पूछा
कुली ने कहा, बाहर जाकर पूछ लो

मैंने खुद ही
रास्‍ता ढूंढ लिया
बाहर जाकर टैक्‍सी वाले से पूछा
भाई साहब, लाल किले का क्‍या लोगे !
जवाब मिला बेचना नहीं है

टैक्‍सी छोड मैंने बस पकड ली
कन्‍डैक्‍टर से पूछा जी क्‍या मैं सिगरेट पी सकता हूं
कन्‍डैक्‍टर गुर्राया और बोला, हरगिज नहीं
तुम्‍हें पता नहीं, यहां सिगरेट पीना मना है
मैंने कहा ! वो जनाब तो पी रहे हैं
कन्‍डैक्‍टर फिर से गुर्राया! और बोला
उसने मुझ से पूछा नहीं है

लाल किले पहुंचा, होटल गया
मैनेजर से कहा, रूम चाहिए, सातवीं मंजिल पर
मैनेजर ने कहा,
रहने के लिए या कूदने के लिए!

रूम पहुंचा, वेटर से बोला
एक पानी का गिलास मिलेगा
उसने जवाब दिया,
नहीं साहब ! यहां तो सारे गिलास कांच के हैं

होटल से निकला दोस्‍त के घर जाने के लिए
रास्‍ते में एक साहब से पूछा
जनाब ये सडक कहां जाती है
जनाब हंस कर बोले,
पिछले बीस साल से देख रहा हूं, यहीं पडी है कहीं जाती ही नहीं है

दोस्‍त के घर पहुंचा देखकर चौंक पडा
उसने पूछा कैसे आना हुआ
अब तक मुझे भी आदत पड गई थी
सीधा जवाब नहीं देने की
मैंने जवाब दिया ट्रेन से आया हूं

आवाभगत करने के लिए मेरी
दोस्‍त ने अपनी बीबी से कहा
अरे सुनती हो मेरा दोस्‍त पहली बार आया है
उसे कुछ ताजा ताजा खिलाओ
सुनते ही भाभी जी ने घर की सारी खि‍डकियां और दरवाजे दिए खोल
और कहा खा लीजिए ताजी ताजी हवा

दोस्‍त ने फिर से बडे प्‍यार से अपनी बीबी से कहा
अरे सुनती हो
जरा इन्‍हें वो चालीस साल पुराना आचार दिखाओ
भाभी जी एक बाल्‍टी में रखा आचार उठा लाई
मैंने भी अपनापन दिखाते हुए कहा,
भाभी जी आचार सिर्फ दिखाएंगी या चखाएंगी भी
भाभी जी ने तपाक से जवाब दिया
यूं ही अगर सब को चखाती, तो चालीस साल से कैसे इसे बचाती

थोडी देर बाद देखा भाभी जी कुछ गा रही हैं
डिप्‍लोमा सो जा डिप्‍लोमा सो जा
सुनकर हुआ मैं हैरान और दोस्‍त से पूछा
यार ये डिप्‍लोमा क्‍या है
दोस्‍त ने जवाब दिया, पोते का नाम है
बेटा बम्‍बई गया था, डिप्‍लोमा लेने के लिए
और साथ में इसे ले आया
इसलिए हमने इसका नाम डिप्‍लोमा रख दिया
फिर मैंने कहा आजकल आपका बेटा क्‍या कर रहा है
दोस्‍त बोला बम्‍बई गया है डिप्‍लोमा लेने के लिए

विनय कौशिक जी के ब्‍लाग से साभार
http://yaracoolcool.blogspot.कॉम