Thursday, 7 August 2008

डिप्‍लोमा

एक दिन
मैं दिल्‍ली पहुंचा
स्‍टेशन पर कुली से बाहर जाने का रास्‍ता पूछा
कुली ने कहा, बाहर जाकर पूछ लो

मैंने खुद ही
रास्‍ता ढूंढ लिया
बाहर जाकर टैक्‍सी वाले से पूछा
भाई साहब, लाल किले का क्‍या लोगे !
जवाब मिला बेचना नहीं है

टैक्‍सी छोड मैंने बस पकड ली
कन्‍डैक्‍टर से पूछा जी क्‍या मैं सिगरेट पी सकता हूं
कन्‍डैक्‍टर गुर्राया और बोला, हरगिज नहीं
तुम्‍हें पता नहीं, यहां सिगरेट पीना मना है
मैंने कहा ! वो जनाब तो पी रहे हैं
कन्‍डैक्‍टर फिर से गुर्राया! और बोला
उसने मुझ से पूछा नहीं है

लाल किले पहुंचा, होटल गया
मैनेजर से कहा, रूम चाहिए, सातवीं मंजिल पर
मैनेजर ने कहा,
रहने के लिए या कूदने के लिए!

रूम पहुंचा, वेटर से बोला
एक पानी का गिलास मिलेगा
उसने जवाब दिया,
नहीं साहब ! यहां तो सारे गिलास कांच के हैं

होटल से निकला दोस्‍त के घर जाने के लिए
रास्‍ते में एक साहब से पूछा
जनाब ये सडक कहां जाती है
जनाब हंस कर बोले,
पिछले बीस साल से देख रहा हूं, यहीं पडी है कहीं जाती ही नहीं है

दोस्‍त के घर पहुंचा देखकर चौंक पडा
उसने पूछा कैसे आना हुआ
अब तक मुझे भी आदत पड गई थी
सीधा जवाब नहीं देने की
मैंने जवाब दिया ट्रेन से आया हूं

आवाभगत करने के लिए मेरी
दोस्‍त ने अपनी बीबी से कहा
अरे सुनती हो मेरा दोस्‍त पहली बार आया है
उसे कुछ ताजा ताजा खिलाओ
सुनते ही भाभी जी ने घर की सारी खि‍डकियां और दरवाजे दिए खोल
और कहा खा लीजिए ताजी ताजी हवा

दोस्‍त ने फिर से बडे प्‍यार से अपनी बीबी से कहा
अरे सुनती हो
जरा इन्‍हें वो चालीस साल पुराना आचार दिखाओ
भाभी जी एक बाल्‍टी में रखा आचार उठा लाई
मैंने भी अपनापन दिखाते हुए कहा,
भाभी जी आचार सिर्फ दिखाएंगी या चखाएंगी भी
भाभी जी ने तपाक से जवाब दिया
यूं ही अगर सब को चखाती, तो चालीस साल से कैसे इसे बचाती

थोडी देर बाद देखा भाभी जी कुछ गा रही हैं
डिप्‍लोमा सो जा डिप्‍लोमा सो जा
सुनकर हुआ मैं हैरान और दोस्‍त से पूछा
यार ये डिप्‍लोमा क्‍या है
दोस्‍त ने जवाब दिया, पोते का नाम है
बेटा बम्‍बई गया था, डिप्‍लोमा लेने के लिए
और साथ में इसे ले आया
इसलिए हमने इसका नाम डिप्‍लोमा रख दिया
फिर मैंने कहा आजकल आपका बेटा क्‍या कर रहा है
दोस्‍त बोला बम्‍बई गया है डिप्‍लोमा लेने के लिए

विनय कौशिक जी के ब्‍लाग से साभार
http://yaracoolcool.blogspot.कॉम

16 comments:

Udan Tashtari said...

हा हा!! बहुत मजेदार!!

PD said...

मस्त.. :)

pallavi trivedi said...

maza aaya...

swati said...

arre waah ,achha hasaya aapne

Mired Mirage said...

वाह! बहुत मजेदार!
घुघूती बासूती

seema gupta said...

"ha ha ha Great, very interesting and enjoyable to read. totally a diffrent mood and phase of your writings..."

बालकिशन said...

हा हा!! बहुत मजेदार!!

महामंत्री-तस्लीम said...

बहुत बढिया चुटकी ली है।
हास्य से सराबोर यह कविता मन को छू गयी और मुझे भीतर तक गुदगुदा गयी।

Advocate Rashmi saurana said...

ha ha ha............ vah ji maja aa gaya padhakar.
Mohan ji aap jis gaane ke liye kah rhe hai vah nahi mil paa rha hai. mere baag ki chidiya...... agar aap film ka naam batayege to shayad me use khoj paaugi.

नीरज गोस्वामी said...

रोज मर्रा की छोटी छोटी बातों में हास्य ढूँढना ही कला है...जो स्पष्ट नजर आयी इस रचना में...बहुत बढ़िया.
नीरज

Shushil Sumkhria said...

Wah...achi lagi..uttam rachna...

सतीश सक्सेना said...

हंसाने के लिए शुक्रिया !

विक्रांत बेशर्मा said...

बहुत अच्छे ...वैसे दिल्ली की एक और खासियत है -"लोग कांफिडेंस से ग़लत रास्ता बताते हैं " !बहुत ही मज़ेदार कविता है !!!!!

महामंत्री-तस्लीम said...

बहुत ही सॉलिड पंच हैं।

*KHUSHI* said...

omg.... has haske lot pot ho gaye.....last one is best.. diploma...

pawan said...

thanks