Saturday, 13 September 2008

ओ मेरे वतन के हत्‍यारों ...



ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...

क्‍या तुम किसी मां के बेटे नहीं
क्‍या तुम किसी मांग के सिंदूर नहीं
क्‍या तुमको किसी राखी की लाज नहीं
क्‍यों करते हो खून खराबा
क्‍या तुमको जनमानस से प्‍यार नहीं
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...

चाहते हो तुम इस मेरे देश में
ना रहे अमन शांति किसी क्षेत्र में
कर लो करना है तुमको जो
होगी शांति होगा मुकाबला
इस वीर वतन मेरे देश में
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...

मत भूलो चंद्रशेखर आजाद भगतसिंह
पैदा हुए थे इसी देश में
चटा दी थी धूल दुश्‍मनों को
इस वीर वतन मेरे देश में
अब बारी है तुम्‍हारी
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...


15 comments:

seema gupta said...

bhut khtrnak or dardnak manjar hai dekh kr dil dehal gya hai. Ye sach mey humare vatan ke dushman hai jinka koe dharm eman nahe hai...

*KHUSHI* said...

shayad ye padha ke un hathiyao ki aankhe khul jaaye... marmsparshi rachana hai aapki... salaam apako...

नव्‍यवेश नवराही said...

पता नहीं इस देश का क्‍या होगा

योगेन्द्र मौदगिल said...

मार्मिक रचना..
संवेदन जागृत करती हुई..
आप धन्य हैं..

MANVINDER BHIMBER said...

मत भूलो चंद्रशेखर आजाद भगतसिंह
पैदा हुए थे इसी देश में
चटा दी थी धूल दुश्‍मनों को
इस वीर वतन मेरे देश में
अब बारी है तुम्‍हारी
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...

sachchi baat likhi hai aapne....pic bhi bahut kuch kah rahe hain

Suitur said...

दरअसल देश और यहाँ के बाशिंदे इसी तरह की त्रासदियों को भोगने के लिए अभिशप्त हैं। चरम पर पहुँच चुके भ्रष्टाचार, अय्याशी और क्षेत्रवाद के बीच देश के बारे में सोचने के लिए किसी के पास फुरसत ही नहीं है। दरअसल सहिष्णुता की आड़ में हम कायरता दिखाते आए हैं। राष्ट्र के बारे में सोच कर निर्णय लेने का समय और क्षमता हमारे पास है ही नहीं। निर्णय के कारक तो सीधे वोट बैक और तुष्टिकरण से जुड़े हुए हैं।

Purnima said...

apne wakai bahut sahi likhahai aur sach mei bahut chinta hoti hai ki desh kahan ja raha hai...

सचिन मिश्रा said...

Bahut accha likha hai...

आलोक कुमार said...

संवेदनात्मक रचना है ये ....

singhsdm said...

मत भूलो चंद्रशेखर आजाद भगतसिंह
पैदा हुए थे इसी देश में
चटा दी थी धूल दुश्‍मनों को
इस वीर वतन मेरे देश में
अब बारी है तुम्‍हारी
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...
मोहन जी दुःख की इस घड़ी में सभी प्रभावितों को हमारी संवेदनाएं, आंतकवाद के ऊपर लगाम ज्यादा कसनी होगी वरना ये घटनाएं होती ही रहेंगी.

ताऊ रामपुरिया said...

आपकी रचना बड़ी मार्मिक और संवेदन शील है ! इंसान
के हत्यारे भला क्या चाहेंगे ? एक देशी कहावत है की
"बुढा मरे या जवान , सिर्फ़ ह्त्या से काम " मानवता
के हत्यारे हैं ये तो !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आज की हालत का सच्चा बयान! धन्यवाद!

फ़िरदौस ख़ान said...

क्‍या तुम किसी मां के बेटे नहीं
क्‍या तुम किसी मांग के सिंदूर नहीं
क्‍या तुमको किसी राखी की लाज नहीं
क्‍यों करते हो खून खराबा
क्‍या तुमको जनमानस से प्‍यार नहीं

बहुत ख़ूब...

रज़िया "राज़" said...

क्‍या तुम किसी मां के बेटे नहीं
क्‍या तुम किसी मांग के सिंदूर नहीं
क्‍या तुमको किसी राखी की लाज नहीं
क्‍यों करते हो खून खराबा
क्‍या तुमको जनमानस से प्‍यार नहीं
ओ मेरे वतन के हत्‍यारों
क्‍या चाहते हो तुम बतलादो...
मोहनजी । इन दरिंदों का ना तो कोइ इमान है, ना ही भगवान। ना कोइ माँ है ना बहन। ना बीवी ना बच्चे। ये तो अपने आप मैं भी "ज़िंदा" हैं या नहिं इन्हें पता नहिं है।इनहें "शैतान" कहें या "हैवान"?

vishnu-luvingheart said...

Jo kuchh bhi aapne likha hai..wo sochne samjhne ki taqat, ichha, savendana ....in logo mein hoti to ye esa kaam hi nahi karte...main wish karunga ki ye desh ke dushman aapki ye panktiya padhe aur 1 baar vichar karen...ki jo kuchh bhi wo kar rahe hai...usse unhe kya hasil hona hai... aur kasam khayen ki esa itihas fir na dohraya jaye...