Sunday, 27 September 2009

जिंदगी कुछ वक्‍त दे मुझे

मेरा अपना घर
जिससे हूं मैं दूर
बहुत दूर
गाहे बगाहे घर जाना
और 
जल्‍दी से घर से लौट वापस आना

क्‍या यही है जिंदगी
क्‍या यही है जिंदगी का दस्‍तूर

घर पर है मेरी बीमार मां
बीमार पिता

और मैं
अकेला
दूर घर से बहुत दूर
ना मां के दर्द को बांट पा रहा हूं
ना पिता की सेवा कर रहा हूं
आखिर क्‍यों
ऐसा जीवन जीने को मजबूर हूं
आखिर क्‍यों

क्‍या इसी को कहते हैं जीवन
क्‍या फायदा मेरे इस जीवन का
जो मैं अपनों के ही दुख दर्द में
उनका सहारा ना बनूं

क्‍यों नहीं कर पा रहा मैं उनकी सेवा
उनके बुढापे में
क्‍यों नहीं बन पा रहा मैं
उनके के बुढापे की लाठी
क्‍यों आखिर क्‍यों

क्‍यूं वक्‍त ले रहा इम्तिहान है
यूं ही ना गुजर जाए जिंदगी तमाम है
इम्तिहान से डरता नहीं हूं मैं
तूफानों से रूकता नहीं हूं मैं
सिर्फ मां के निस्‍वार्थ प्रेम को
भूलता नहीं हूं मैं
फिर कैसे उन्‍मुख हो जाऊं
कैसे कर्तव्‍य विमुख हो जाऊं
जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं

Monday, 21 September 2009

भारत धरती मां है हमारी

भारत धरती मां है हमारी
हम सब इसकी संतान
इससे है पहचान हमारी
हम इसकी पहचान
भारत धरती मां है हमारी 

हम हैं भारत के बच्‍चे
ये हमको है अभिमान
दुश्‍मन इस पर नजर जो डाले
ले लें उसकी जान
भारत धरती मां है हमारी 

अगर पडी जो इसे जरूरत
कभी हमारी जान की
इक पल की ना देर लगाएं
हंसकर दें बलिदान
भारत धरती मां है हमारी

(बिटिया के स्‍कूल में गीत फेस्‍टीवल था। तो कुछ सूझा नहीं हमारी पत्‍नी जी ने इन चार लाईनों को लिखा और बिटिया को सिखा दिया।  हमारी बिटिया ने उसे अपनी तोतली सी आवाज में अपनी टीचर को सुनाया और काफी खुश हुईं। )

Tuesday, 8 September 2009

बन जा मेरी मात यशोदा

काफी दिन पहले मेरी धर्मपत्‍नी द्वारा लिखित एक भजन आज आपको पढा रहा हूं आशा है आप सभी को पसंद आएगी। यह भजन मेरी पत्‍नी ने जन्‍माष्‍टमी पर लिखा था लेकिन कुछ व्‍यस्‍तता के चलते आज इसे आप सभी को पढवा रहा हूं

तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्‍हा बन जाऊं
जा यमुना के तीरे मां
बंशी मधुर बजाऊं
इक छोटा सा बाग लगा दे
जहां झूमूं नाचू गाऊं
घर-घर जाकर माखन मिश्री
चुरा चुरा के खाऊं
इक छोटी सी राधा लादे
जिसके संग रास रचाऊं
तू ढूंढे मुझे वन उपवन
मैं पत्‍तों में छिप जाऊं
तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्‍हा बन जाऊं

Sunday, 6 September 2009

साहिर लुधियानवी जी के शेर

आज की कडी में हम आपको पढा रहे हैं साहिर लुधियानवी के शेरों की एक सीरिज तो बस कुछ मत सुनो बस पढो और बताओ कि आज की पेशकश कैसी रही  तो आज पेश हैं साहिर लुधियनवी जी के शेर
 मैं और तुम से तर्के-मोहब्‍बत की आरजू
दीवाना कर दिया है गमें रोजगार ने
अभी न छेड मोहब्‍बत के गीत ए मुतरिब
अभी हयात का माहौल साजगार नहीं

अश्‍कों में जो पाया वो गीतों में दिया है
इस पर भी सुना है कि जमाने को गिला है
नगमा जो रूह में है, नै में कुछ नहीं
गर तुझ में कुछ नहीं तो किसी शै में कुछ नहीं
हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया

करें तो हम भी, मगर किस खुदा की बात करें
देखा है जिंदगी को कुछ इतना करीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
माना कि इस जहां को गुलजार न कर सके

कुछ खार कम तो कर गए
गुजरे जिधर से हम
ले दे के अपने पास फख्त इक नजर तो है
क्यों देखें जिंदगी को किसी की नजर से हम


निकले थे कहां जाने के लिए
पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं
अब अपने भटकते कदमों को
मंजिल का निशां मालूम नहीं

बुझ रहे हैं एक एक करके अकीदों के दिये
इस अंधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है

उम्र भर रेंगते रहने की सजा है जीना
एक-दो दिन की अजीयत हो तो कोई सह ले

अभी जिंदा हूं लेकिन सोचता रहता हूं खल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

मुफिलसी हिस्से लताफत को मिटा देती है
भूख आदाब के सांचों में नहीं ढल सकती

मुझ को कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूं
इश्क नाकाम सही, जिन्दगी नाकाम नहीं

सियह-नसीब कोई हम से बढ के क्या होगा
जो अपना घर भी जला दे तो रौशनी न मिले
तुम मेरे लिए अब कोई इल्जाम न ढूंढो
चाहा था तुम्हें, इक यही इल्जाम बहुत है

 प्रस्‍तुत कर्ता मोहन वशिष्‍ठ, साहिर लुधियानवी जी की एक किताब से साभार 

Tuesday, 1 September 2009

हो रही है बारिश झम -झमाझम

हो रही है बारिश झम- झमाझम
नाच रहे हैं पेड छम -छमाछम
बह रही है पवन सन -सनासन
हो रही है बारिश झम -झमाझम

नहीं निकला सूरज तम- तमाकर
छिप गया बादलों में दुम दबाकर
भर गया पानी लब- लबालब
हो रही है बारिश झम- झमाझम

गा रहे हैं पक्षी चह -चहाकर
मेंढक भी टर्राया टर- टराटर
पत्‍ते भी खिले चम -चमाकर
हो रही है बारिश झम- झमाझम

धरती भी हुई गीली तर- तरातर
बच्‍चों ने की मस्‍ती छम -छमाछम
आया सावन हर- हराहर
हो रही है बारिश झम- झमाझम

Sunday, 30 August 2009

अधखिला फूल

आज फिर बारिश हुई
सबके चेहरे खिले
फूल खिले
पेड खिले
खिला नवयौवन भी
बस, नहीं खिला तो
एक फूल
जो अभी अधखिला था
गिर गया
इस बारिश से
और फिर वो अधखिला फूल
समा गया
पानी के आगोश में
और बह गया दूर
बहुत दूर
पानी के आगोश में

Thursday, 13 August 2009

श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी की हार्दिक बधाईयां



जय श्री कृष्‍णा
जय जय श्री राधे

आप सभी को श्री कृष्‍ण जी के जन्‍मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं


अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं
सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं

वंदे मातरम्

Tuesday, 11 August 2009

अंधा प्‍यार या अंधा इंसान


एक अंधा लडका सभी लोगों से बहुत घृणा करता था। वह किसी से बात करना भी मुनासिब नहीं समझता था। लेकिन वह लडका एक लडकी से बेइंत्‍हा प्‍यार करता था और उसके बिना रह भी नहीं सकता था। दोनों में बहुत सारी प्‍यार भरी बातें होती थीं। लडकी भी बेइंत्‍हां प्‍यार करती थी उस लडके को। एक दिन वह लडका लडकी से बातें कर रहा था, और बोला कि दोस्‍त मैं देख नहीं सकता, अगर मैं देखता तो बिल्‍कुल तुमही से शादी करता। एक दिन एक भद्र पुरुष ने अपनी आंखें उसी अंधे लडके को दान कर दी। फिर वह नई आंखों से दुनिया को देखने लगा। जब वह उस लडकी से मिला जिसे वह सबसे ज्‍यादा प्‍यार करता था तो देखा कि वह लडकी भी अंधी है। अब उस लडकी ने पूछा, कि अब तुम दुनिया को देखने लगे हो, क्‍या अब तुम मुझसे शादी करोगे। अब लडके के अंदर दुनिया में फिर से देख पाने का घमंड आ गया था, तो उसने स्‍वार्थपूर्ण तरीके से कहा, नहीं। मैं, तुमसे शादी नहीं कर सकता। लडकी ने बहुत ही प्‍यार के साथ उसे जबाव दिया कोई बात नहीं। मेरी बात का बुरा मत मानना। लेकिन मेरी तुमसे एक विनती है, एक अरदास है, लडका बोला, क्‍या । लडकी बोली, मेरी आंखों को हिफाजत से रखना। (अत: कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने अतीत में झांककर देखो, मत भूलो मत भूलो )

Saturday, 8 August 2009

बादलों जैसा जोश

गर हो जाए बादलों जैसा जोश हर इन्‍सां में
कभी तो सूरज को ले लेते हैं अपने आगोश में

गर हो जाए पानी जैसा तेज हर इन्‍सां
कभी तो पहाडों से रास्‍ता बना ही ले

Sunday, 5 July 2009

फुरसत के लम्‍हे


नमस्‍कार साथियों
माफ करना आजकल थोडी दिक्‍कतें आ रही हैं इसलिए ज्‍यादा समय नहीं बिता पा रहा हूं आप सभी के साथ। आज आप को थोडा मुस्‍कुराता देखने को दिल कर रहा है इसलिए आप सभी के साथ एक हास्‍य कविता सांझा कर रहा हूं जिसे लिखा है हमारे विजय जैन जी ने तो पेश है आपकी खिदमत में फुरसत के लम्‍हे



हम फुरसत में कुछ लम्‍हे इस तरह गुजारा करते हैं
होटों से चबाकर मूंगफली, छिलके उन पर मारा करते हैं

एक दिन हमको वो खिडकी पर नजर आ रही थीं
वो हमको देखकर धीरे से मुस्‍कुरा रही थीं
हम भी उन्‍हें देखकर मुस्‍कुराने लगे
हाथ में जो मूंगफली थी, उसे चबाने लगे
उस समय आ रहा था हमें बहुत नजारा
तभी हमने उन पर मूंगफली का छिलका मारा

अचानक सामने से उसका बाप आ टपका
छिलके को उसने रास्‍ते में ही लपका
छिलका फैंककर बंदूक उसने उठा ली थी
मुझे मारने की कसम जैसे खा ली थी
मुझे भी डर लग रहा था घर से बाहर आने में
इसलिए छिप गया मैं पडोसन के गुसलखाने में
पडोसन के कपडों को भी हम बडे प्‍यार से निहारा करते हैं
होटों से चबाकर मूंगफली...

उसका बाप पहुंच चुका था अब रास्‍ते में
मैंने सोचा कि जान जाएगी मेरी सस्‍ते में
मेरी जान अटक पडी थी एक खूंटी पर
तभी मेरा हाथ चला गया वहां टूटी पर
उधर, उसका बाप गुस्‍से में लाल पीला हो रहा था
इधर, मैं टूटी के नीच खडा गीला हो रहा था

फिर सोचा कि टूटी को अब बंद किया जाए
उस जल्‍लाद से बचने का कुछ प्रबंध किया जाए
तेरी याद में गजलें लिख लिखकर रैपर पर उतारा करतें हैं
होटों से चबाकर मूंगफली...

मैंने सोचा कि अब तू बहुत डर चुका
ऐसे नहीं मिल पाएगी तुझे तेरी माशूका
मैं यह सोचकर उसके बाप के सामने आ गया
उसका बाप मुझे देखकर पहले घबरा गया
फिर उसने बंदूक मेरी बाहों में अडा दी
मैंने फुकरा बनकर छाती आगे बढा दी
मेरा फुकरापन उस समय किधर गया
जब उसने गोली चलाई और मैं मर गया
जन्‍नत में भी हम बैठकर तुझको ही पुकारा करते हैं
होटों से चबाकर मूंगफली...