Sunday, 6 September 2009

साहिर लुधियानवी जी के शेर

आज की कडी में हम आपको पढा रहे हैं साहिर लुधियानवी के शेरों की एक सीरिज तो बस कुछ मत सुनो बस पढो और बताओ कि आज की पेशकश कैसी रही  तो आज पेश हैं साहिर लुधियनवी जी के शेर
 मैं और तुम से तर्के-मोहब्‍बत की आरजू
दीवाना कर दिया है गमें रोजगार ने
अभी न छेड मोहब्‍बत के गीत ए मुतरिब
अभी हयात का माहौल साजगार नहीं

अश्‍कों में जो पाया वो गीतों में दिया है
इस पर भी सुना है कि जमाने को गिला है
नगमा जो रूह में है, नै में कुछ नहीं
गर तुझ में कुछ नहीं तो किसी शै में कुछ नहीं
हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया

करें तो हम भी, मगर किस खुदा की बात करें
देखा है जिंदगी को कुछ इतना करीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
माना कि इस जहां को गुलजार न कर सके

कुछ खार कम तो कर गए
गुजरे जिधर से हम
ले दे के अपने पास फख्त इक नजर तो है
क्यों देखें जिंदगी को किसी की नजर से हम


निकले थे कहां जाने के लिए
पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं
अब अपने भटकते कदमों को
मंजिल का निशां मालूम नहीं

बुझ रहे हैं एक एक करके अकीदों के दिये
इस अंधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है

उम्र भर रेंगते रहने की सजा है जीना
एक-दो दिन की अजीयत हो तो कोई सह ले

अभी जिंदा हूं लेकिन सोचता रहता हूं खल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

मुफिलसी हिस्से लताफत को मिटा देती है
भूख आदाब के सांचों में नहीं ढल सकती

मुझ को कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूं
इश्क नाकाम सही, जिन्दगी नाकाम नहीं

सियह-नसीब कोई हम से बढ के क्या होगा
जो अपना घर भी जला दे तो रौशनी न मिले
तुम मेरे लिए अब कोई इल्जाम न ढूंढो
चाहा था तुम्हें, इक यही इल्जाम बहुत है

 प्रस्‍तुत कर्ता मोहन वशिष्‍ठ, साहिर लुधियानवी जी की एक किताब से साभार 

8 comments:

Udan Tashtari said...

साहिर लुधियनवी जी के शेर पढ़वाने का बहुत आभार.आनन्द आ गया.

अनिल कान्त : said...

Bhai maza aa gaya

कुलवंत हैप्पी said...

आपकी प्रस्तुति शानदार : कुछ दिन पहले ही मैंने साहिर लुधियानवीं की एक इंटरव्यू पढ़ी, जो नरेश कुमार शाद ने ली, बरसों से वो मेरे एक किताबों के बैग में पड़ी धूल फांक रही थी, लेकिन जब पढ़ी तो मैं दंग रह गया। बहुत शानदार व्यक्तितत्व का शख्स था अब्दुल हुई उर्फ साहिर लुधियानवीं। मजाकिया मजाक के भी थे साहिर लुधियानवीं

Babli said...

वाह वाह क्या बात है! एक से बढ़कर एक शेर! बड़ा मज़ेदार लगा ! बहुत खूब मोहन जी!
मेरे नए ब्लॉग पर आपका स्वागत है -
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह जी वाह साहिर जी को पढकर आनंद आ गया। शुक्रिया पढवाने के लिए।

फ़िरदौस ख़ान said...

क्या बात है! क्या बात है!

अल्पना वर्मा said...

waah ! waah! waah!!

Yudhisthar raj said...

बेहद शानदार प्रस्तुति ..!