Sunday, 27 September 2009

जिंदगी कुछ वक्‍त दे मुझे

मेरा अपना घर
जिससे हूं मैं दूर
बहुत दूर
गाहे बगाहे घर जाना
और 
जल्‍दी से घर से लौट वापस आना

क्‍या यही है जिंदगी
क्‍या यही है जिंदगी का दस्‍तूर

घर पर है मेरी बीमार मां
बीमार पिता

और मैं
अकेला
दूर घर से बहुत दूर
ना मां के दर्द को बांट पा रहा हूं
ना पिता की सेवा कर रहा हूं
आखिर क्‍यों
ऐसा जीवन जीने को मजबूर हूं
आखिर क्‍यों

क्‍या इसी को कहते हैं जीवन
क्‍या फायदा मेरे इस जीवन का
जो मैं अपनों के ही दुख दर्द में
उनका सहारा ना बनूं

क्‍यों नहीं कर पा रहा मैं उनकी सेवा
उनके बुढापे में
क्‍यों नहीं बन पा रहा मैं
उनके के बुढापे की लाठी
क्‍यों आखिर क्‍यों

क्‍यूं वक्‍त ले रहा इम्तिहान है
यूं ही ना गुजर जाए जिंदगी तमाम है
इम्तिहान से डरता नहीं हूं मैं
तूफानों से रूकता नहीं हूं मैं
सिर्फ मां के निस्‍वार्थ प्रेम को
भूलता नहीं हूं मैं
फिर कैसे उन्‍मुख हो जाऊं
कैसे कर्तव्‍य विमुख हो जाऊं
जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं

25 comments:

वन्दना said...

ek behtreen rachna likhi hai.......maa baap ke rin se urin hona , unke dard ko mehsoos karna ...........aapne jeevan ke yatharth ko utar diya hai.

विनोद कुमार पांडेय said...

Bahut badhiya baat kahe hai aap kavita me par jindagi ki raah me aise aise mod aate rahate hai jab hame apno se hi door jana padata hai..

bahut badhiya rachana...badhayi..

Udan Tashtari said...

जीवन की मजबूरियाँ ऐसी होती हैं कि हमें अनेक समझौते करने होते हैं. जितना भी अधिक से अधिक कर पायें, करिये लेकिन चलते जाने का नाम ही जीवन है.


" जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं"

चाहे जितना भी वक्त मिल जाये, यह कभी नहीं हो सकता. माता पिता के ऋण से आजतक कोई उऋण हुआ है भला?

ओम आर्य said...

बहुत ही सुन्दर मनो भाव अतिसुन्दर!
जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं"

ऐसा सम्भव ही नही है !

संदीप कुमार said...

कविता के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया
बहुत ही मनभावन कविता है

काजल कुमार Kajal Kumar said...

यही जीवन है

बी एस पाबला said...

ज़िंदगी की जद्दोजहद के बीच कर्त्तव्य की याद बेहद छटपटाती है।

बहुत ही मनभावन कविता

बी एस पाबला

महाबीर सेठ said...

ham logon ki yahi kahani hai...
yahi pareshani hai....
kya kiya ja sakta hai...

राज भाटिय़ा said...

मोहन भाई बहुत सी मजबुरिया ऎसी ही होती है, जो मां बाप की सेवा करना चाहते है, भगवान उन्हे मजबुर कर देता है, ओर जिन के पास समय होता है उन्हे मां बाप की कदर नही होती.... बस जिन्दगी इसी का नाम है...
बहुत सुंदर कविता के भाव है, अच्छा लगा, कुछ दर्द सा सिमट आया...
धन्यवाद

आकांक्षा~Akanksha said...

Behad sundar abhivyakti...dil ko chhuti panktiyan.

Babli said...

बहुत ही ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने ! दिल को छू गई आपकी ये शानदार रचना! दशहरे की हार्दिक शुभकामनायें!

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह मौहन जी क्या खूब कविता कही है वाह....

अल्पना वर्मा said...

-bahut achchhee kavita Mohan ji.

-विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें.
Abhaar

Harkirat Haqeer said...

भूलता नहीं हूं मैं
फिर कैसे उन्‍मुख हो जाऊं
कैसे कर्तव्‍य विमुख हो जाऊं
जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं

माता-पिता की सेवा में समर्पित रचना ....!!

दूर रहते हुए भी आपके मन के ख्यालात भी उनकी सेवा जैसे ही तो हैं .....!!

हाँ सुना है ताऊ जी आपसे नाराज़ हैं क्या बात हो गई ....???

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इस खूबसूरत रचना के लिए बधाई!

असत्य पर सत्य की जीत के पावन पर्व
विजया-दशमी की आपको शुभकामनाएँ!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

saarthak rachnaa......

Acharya Kishore Ji said...

jivan ki majburi par likhi behatrin rachna

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

" जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं"

क्या बात कही है मित्र!

naveentyagi said...

bahut marmik kavy rachna hai.

MUFLIS said...

mn ki kasak ko shabdoN meiN
pirone ki prakriyaa hi aapki rachna-sheelta ki parichayak bn gayi hai
achhe aur nek khayaalaat ke liye abhivaadan svikaareiN

---MUFLIS---

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत सुन्दर...

" जिंदगी कुछ वक्‍त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं"

इस खूबसूरत रचना के लिए बधाई...

monali said...

Achha laga aapke maan me maa-pita k liye izzat k sath sath pyaar bhi dekh kar...sundar rachna...

अल्पना वर्मा said...

Mohan जी बहुत दिनों से आप ने कुछ नया post नहीं किया.
आप को और parivar में सभी को दिवाली की dher sari शुभकामनायें.

kshama said...

Bahut saare kyon leke ham jeete rahte hain..shayad hareke jeevan kee baat kahee aapne..kab mukammal jahan mila?

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर कविता के भाव है, अच्छा लगा, कुछ दर्द सा सिमट आया...