Sunday, 30 August 2009

अधखिला फूल

आज फिर बारिश हुई
सबके चेहरे खिले
फूल खिले
पेड खिले
खिला नवयौवन भी
बस, नहीं खिला तो
एक फूल
जो अभी अधखिला था
गिर गया
इस बारिश से
और फिर वो अधखिला फूल
समा गया
पानी के आगोश में
और बह गया दूर
बहुत दूर
पानी के आगोश में

12 comments:

RAJESHWAR VASHISTHA said...

Congrats..for a beautiful poem..

समयचक्र said...

बढ़िया भाव बारिश और अधखिले फूल पर. वाह भाई उम्दा.

M VERMA said...

बहुत सुन्दर भाव.
बेहतरीन

अमिताभ मीत said...

बढ़िया है.

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी रचना.... वाह..

mehek said...

sunder bhav,kuch phoolon ka jevan hi utana hota hai,aadha sa.

usharai said...

प्रकृति कभी कभी जड़ता दिखाती है !
अति सुंदर है ये सार्थक रचना !!!!!

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर कविता, भाई तुम्हे फ़ोन करता हुं तो हमेशा बन्द मिलता है, क्या बन्द रखने के लिये ही फ़ोन लिया है.

seema gupta said...

सुन्दर अभिव्यक्ति....

regards

अल्पना वर्मा said...

adhkhile phool par sundar kavia likhi hai Mohan ji.

[aap ke blog ke feed nahin aati hai..isliye aap ki nayi post ka maluum nahin chalaa.aap se narajagi ki koi baat nahin hai.aap apne blog ki setting mein feed ki setting check karen...
agar poori feed open nahin karna chahte to thodi open wale option ko select karen ...Blog roll mein recent post nahin dekh pane ki wajah se aapki rachnaon tak nahin pahunch payi thi.

hem pandey said...

इस संसार में बहुतों के साथ ऐसा ही होता है.

Babli said...

आपके ब्लॉग पर आने में देरी हुई उसके लिए माफ़ी चाहती हूँ! बहुत अच्छा लगा बड़े लंबे अरसे के बाद आपका टिपण्णी मिलने पर!
बहुत ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना मुझे बेहद पसंद आया! बहुत बढ़िया लिखा है आपने!
मेरे नए ब्लॉग पर आपका स्वागत है -
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com