Friday, 12 September 2008

उदास याद













तुम्‍हारी आने से याद
हो जाता है दिल उदास
अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास

तुम्‍हें क्‍यों करूं मैं याद
क्‍या तुमने दिया मुझे
दुख, दर्द और तकलीफ
क्‍या काफी नहीं है जिंदगी के लिए
अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास


पहले नहीं करता था याद
तो हो जाता था दिल उदास
अब करता हूं तुम्‍हें याद
तो हो जाता हूं और ज्‍यादा उदास
अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास

चलो आज से तुम्‍हें
एक नाम दे दूं
उदास याद
इसमें याद भी है और
याद आने के बाद
मिलने वाली उदासी भी

अब नहीं करता तुम्‍हें याद
हो जाता है दिल उदास

Sunday, 7 September 2008

हमारी तुम्‍हारी मुलाकात

हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल
जब मिले थे हम दोनों
पता न था कि
इतना लंबा सफर
तय कर पाएंगे
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल




लद गए दिन मस्‍ती के
छा गया घोर अंधेरा
एक ठोकर लगी
छूट गया साथ तेरा
टूट गया हसीं सपना
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल

अब मेरा अपना ही घर
वीराना सा हो गया
कोई नहीं है साथ में मेरे
ये जहां भी
पराया सा हो गया
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल

अब न तुम हो पास
है केवल तन्‍हाई ही साथ
और वो पल जो
मिले थे मुझे
जब तुम मिले
और कुछ नहीं है पास
हमारी तुम्‍हारी मुलाकात
बन गई एक मिसाल

Thursday, 7 August 2008

डिप्‍लोमा

एक दिन
मैं दिल्‍ली पहुंचा
स्‍टेशन पर कुली से बाहर जाने का रास्‍ता पूछा
कुली ने कहा, बाहर जाकर पूछ लो

मैंने खुद ही
रास्‍ता ढूंढ लिया
बाहर जाकर टैक्‍सी वाले से पूछा
भाई साहब, लाल किले का क्‍या लोगे !
जवाब मिला बेचना नहीं है

टैक्‍सी छोड मैंने बस पकड ली
कन्‍डैक्‍टर से पूछा जी क्‍या मैं सिगरेट पी सकता हूं
कन्‍डैक्‍टर गुर्राया और बोला, हरगिज नहीं
तुम्‍हें पता नहीं, यहां सिगरेट पीना मना है
मैंने कहा ! वो जनाब तो पी रहे हैं
कन्‍डैक्‍टर फिर से गुर्राया! और बोला
उसने मुझ से पूछा नहीं है

लाल किले पहुंचा, होटल गया
मैनेजर से कहा, रूम चाहिए, सातवीं मंजिल पर
मैनेजर ने कहा,
रहने के लिए या कूदने के लिए!

रूम पहुंचा, वेटर से बोला
एक पानी का गिलास मिलेगा
उसने जवाब दिया,
नहीं साहब ! यहां तो सारे गिलास कांच के हैं

होटल से निकला दोस्‍त के घर जाने के लिए
रास्‍ते में एक साहब से पूछा
जनाब ये सडक कहां जाती है
जनाब हंस कर बोले,
पिछले बीस साल से देख रहा हूं, यहीं पडी है कहीं जाती ही नहीं है

दोस्‍त के घर पहुंचा देखकर चौंक पडा
उसने पूछा कैसे आना हुआ
अब तक मुझे भी आदत पड गई थी
सीधा जवाब नहीं देने की
मैंने जवाब दिया ट्रेन से आया हूं

आवाभगत करने के लिए मेरी
दोस्‍त ने अपनी बीबी से कहा
अरे सुनती हो मेरा दोस्‍त पहली बार आया है
उसे कुछ ताजा ताजा खिलाओ
सुनते ही भाभी जी ने घर की सारी खि‍डकियां और दरवाजे दिए खोल
और कहा खा लीजिए ताजी ताजी हवा

दोस्‍त ने फिर से बडे प्‍यार से अपनी बीबी से कहा
अरे सुनती हो
जरा इन्‍हें वो चालीस साल पुराना आचार दिखाओ
भाभी जी एक बाल्‍टी में रखा आचार उठा लाई
मैंने भी अपनापन दिखाते हुए कहा,
भाभी जी आचार सिर्फ दिखाएंगी या चखाएंगी भी
भाभी जी ने तपाक से जवाब दिया
यूं ही अगर सब को चखाती, तो चालीस साल से कैसे इसे बचाती

थोडी देर बाद देखा भाभी जी कुछ गा रही हैं
डिप्‍लोमा सो जा डिप्‍लोमा सो जा
सुनकर हुआ मैं हैरान और दोस्‍त से पूछा
यार ये डिप्‍लोमा क्‍या है
दोस्‍त ने जवाब दिया, पोते का नाम है
बेटा बम्‍बई गया था, डिप्‍लोमा लेने के लिए
और साथ में इसे ले आया
इसलिए हमने इसका नाम डिप्‍लोमा रख दिया
फिर मैंने कहा आजकल आपका बेटा क्‍या कर रहा है
दोस्‍त बोला बम्‍बई गया है डिप्‍लोमा लेने के लिए

विनय कौशिक जी के ब्‍लाग से साभार
http://yaracoolcool.blogspot.कॉम

Thursday, 31 July 2008

चेहरे का नूर

देखकर तेरे चेहरे का नूर
पतझड में भी आ जाती है बहार
हो जाए खुदा भी कायल तेरा
देखकर तेरे चेहरे का नूर

जब चलती है तू इठलाकर
हो जाती है है मस्‍त पवन
झूमते हैं बादल गाता है ये गगन
देखकर तेरे चेहरे का नूर

हंसती है जब तू खिलखिलाकर
चमन का हो जाता है श्रृंगार
सूखे झरने में आ जाती है फुहार
देखकर तेरे चेहरे का नूर

निकले जब खुली जुल्‍फों को चेहरे पे बिखेर
चुप हो जायें काले बादल मुंह को फेर
शर्मा जाती है कायनात भी हुजुर
देखकर तेरे चेहरे का नूर

उन लम्‍हों में तेरा नूर
करता है चांद को भी बेनूर
असंख्‍य तारों के बीच से
उतरे जमीन पर एक कोहिनूर
देखकर तेरे चेहरे का नूर

Monday, 28 July 2008

तुम लगते हो कौन मेरे



मैं तुमसे मोहब्‍बत कर तो लूं लेकिन
फिर सोचता हूं कि
तुम लगते हो कौन मेरे
तुम करोगे बस बेइन्‍तहा प्‍यार
इतना तुम पर एतबार कर लूं कैसे
फिर सोचता हूं कि
तुम लगते हो कौन मेरे

दिल पे हो मेरे तुम्‍हारा ही इख्तियार
तुम बनाओगे बहाने हजार यार
दो घडी तुम्‍हारा इंतजार कर लूं कैसे
फिर सोचता हूं कि
तुम लगते हो कौन मेरे

मैं सोचता हूं तुमको बता दूं आज
तुम हर सांस में बसी हो मेरे
तुम हर जज्‍वात से उलझती हो मेरे
तुम हर प्‍यार में झलकती हो मेरे
फिर सोचता हूं कि
तुम लगते हो कौन मेरे

तू जान है मेरी तेरी यादों से ही
गुजरती है जिंदगी मेरी
तेरी जुल्‍फों में खो जाऊं
तुम रूठो तो तुम्‍हें मनाऊं
फिर सोचता हूं कि
तुम लगते हो कौन मेरे

Thursday, 24 July 2008

कभी प्‍यार से आबाद मैं भी था



कभी प्‍यार से आबाद मैं भी था
इस प्‍यार के जहां में नायाब मैं भी था
क्‍या हुआ आज हम हैं बर्बाद अगर
प्‍यार के जहां में इरशाद कभी मैं भी था

वफा से उनकी जीना मैने सीखा था
जफा से उनकी रोना मैंने सीखा था
वादा या रब साथ जीने मरने का था

वफा ए यार सितम सब चलता था
मुहब्‍बत का मजाक भी कभी बनता था
हाथों से हाथ साहिल से नाता जुडता था
राहों में भटकते गमों से भी पाला पडता था


सोचा हबीब जिसे वो रकीब का मिलना था
दिल ए नादान को मिले जख्‍मों को सिलना था

क्‍या खबर थी सितमगर को जुल्‍म ढाना था
प्‍यार में उनके हमें धोखा ही खाना था
वफा हमारी में बेवफा उनको तो हो जाना था

Tuesday, 22 July 2008

हे पार्थ

कृप्‍या नौकरीशुदा भाई ही पढें। क्‍योंकि आजकल इंक्रीमेंट के मामले में हर कंपनी का मैनेजमेंट का बस ऐसा ही हाल होता है।




Saturday, 12 July 2008

कोई



ऐ काश मुझपे इतना ऐतबार करे कोई
मेरी चाहत है वो ये मान जाए कोई

मेरी आंखों में बसा है बेइंतहा प्‍यार
ऐ काश उस प्‍यार को पहचान पाए कोई

दिल ये चाहे मुझे छेडे और सताए कोई
मैं ना मानू जो सताने से तो रूठ जाए कोई

हर आहट पे मेरे आने का गुमान करके
मेरे साये से यूं दौड कर लिपट जाए कोई

मेरी सांसों में समाने वाली खुशबू की तरह
मेरी बाहों में यूं तडप कर बिखर जाए कोई

मेरे जीने का सहारा भी कभी टूट जाएगा
मरने के बाद ही सही मेरे नाम का सिंदूर सजाए कोई

Friday, 11 July 2008

एक बच्‍चा

जेठ की टीक दुपहरी में
एक बच्‍चा, जो सेठ नहीं है
जिसके पैरों में डील के निशान
तन पर मैले-कुचैले फटे चीथडे
चेहरे पर चमक और आशा की किरण
हाथ में कुछ रूपये दबाए हुए
चला आया उस खाने की दुकान पर
जहां बडे बडे सेठ लोग
खा रहे हैं लजीज खाना
और देखकर बच्‍चे की ओर
मुंह बिचकाकर बोले
आ गया भिखारी
लेकिन अभी तो
बच्‍चे ने कुछ मांगा भी नहीं
वो तो पहले ही
कहीं से मांगकर लाया
कुछ रूपये
और चला आया
खाना लेने
उस दुकान पर
जहां बडे बडे सेठ लोग
खा रहे हैं लजीज खाना
नहीं आना चाहिए था उसे यहां
क्‍योंकि यहां मना है
उनका आना
जिनके पास कपडे नहीं हैं
पैरों में चप्‍पल नहीं हैं
हाथ में पैसे हैं तो क्‍या हुआ
वो सेठ भी तो नहीं हैं ना

Wednesday, 9 July 2008

क्‍या करते

चोट खाकर भी मुस्कुराते नहीं तो क्या करते।
दिल के जज्बात दिल में दबाते नहीं तो क्या करते।।
भरी महफिल में जब उन्होंने न पहचाना हमको।
नजर हम अपनी झुकाते नहीं तो क्या करते।।
उनके दुपट्टे में लगी आग न हमसे देखी जाती।
हाथ हम अपना जलाते नहीं तो क्या करते।।
दोस्तों ने जब सरे राह छोड दिया मुझको।
तब हम गैरों को बुलाते नहीं तो क्या करते।।
किस मुददत से वो देख रहा था राह मेरी।
वादा हम अपना निभाते नहीं तो क्या करते।।
चोट खाकर भी मुस्कुराते नहीं तो क्या करते।।
दिल के जज्बात दिल में दबाते नहीं तो क्या करते।
विजय जैन