Friday, 11 July 2008

एक बच्‍चा

जेठ की टीक दुपहरी में
एक बच्‍चा, जो सेठ नहीं है
जिसके पैरों में डील के निशान
तन पर मैले-कुचैले फटे चीथडे
चेहरे पर चमक और आशा की किरण
हाथ में कुछ रूपये दबाए हुए
चला आया उस खाने की दुकान पर
जहां बडे बडे सेठ लोग
खा रहे हैं लजीज खाना
और देखकर बच्‍चे की ओर
मुंह बिचकाकर बोले
आ गया भिखारी
लेकिन अभी तो
बच्‍चे ने कुछ मांगा भी नहीं
वो तो पहले ही
कहीं से मांगकर लाया
कुछ रूपये
और चला आया
खाना लेने
उस दुकान पर
जहां बडे बडे सेठ लोग
खा रहे हैं लजीज खाना
नहीं आना चाहिए था उसे यहां
क्‍योंकि यहां मना है
उनका आना
जिनके पास कपडे नहीं हैं
पैरों में चप्‍पल नहीं हैं
हाथ में पैसे हैं तो क्‍या हुआ
वो सेठ भी तो नहीं हैं ना

2 comments:

seema gupta said...

ek bhavnatmk rachna jindgee ke bhut kareeb. Evry word while reading creates the real image in the mind. Liked reading it ya.

vandana said...

jab aap jante nhi likhna tab to itni sundar prastuti hai aur khin jyada likhna aata to kya karte?sir aapki rachna bahut hi sundar hai.aap to bahut hi sundar likhte hain.