
कभी प्यार से आबाद मैं भी था
इस प्यार के जहां में नायाब मैं भी था
क्या हुआ आज हम हैं बर्बाद अगर
प्यार के जहां में इरशाद कभी मैं भी था
वफा से उनकी जीना मैने सीखा था
जफा से उनकी रोना मैंने सीखा था
वादा या रब साथ जीने मरने का था
वफा ए यार सितम सब चलता था
मुहब्बत का मजाक भी कभी बनता था
हाथों से हाथ साहिल से नाता जुडता था
राहों में भटकते गमों से भी पाला पडता था
इस प्यार के जहां में नायाब मैं भी था
क्या हुआ आज हम हैं बर्बाद अगर
प्यार के जहां में इरशाद कभी मैं भी था
वफा से उनकी जीना मैने सीखा था
जफा से उनकी रोना मैंने सीखा था
वादा या रब साथ जीने मरने का था
वफा ए यार सितम सब चलता था
मुहब्बत का मजाक भी कभी बनता था

हाथों से हाथ साहिल से नाता जुडता था
राहों में भटकते गमों से भी पाला पडता था
सोचा हबीब जिसे वो रकीब का मिलना था
दिल ए नादान को मिले जख्मों को सिलना था
दिल ए नादान को मिले जख्मों को सिलना था
क्या खबर थी सितमगर को जुल्म ढाना था
प्यार में उनके हमें धोखा ही खाना था
वफा हमारी में बेवफा उनको तो हो जाना था
प्यार में उनके हमें धोखा ही खाना था
वफा हमारी में बेवफा उनको तो हो जाना था
19 comments:
सोचा हबीब जिसे वो रकीब का मिलना था
दिल ए नादान को मिले जख्मों को सिलना था
क्या बात है जनाब आप तो छा गए सच में बहुत ही ख़ूबसूरत शब्दो में पिरोई है रचना।
आप तो बहुत मीने-मीसने निकले।
बधाई हो।
महोदय जी....,प्यार को इन शब्दों में गूंथा.... बडा अच्छा लगा... शब्दों से बता नहीं सकता.... कि कितना...
बेहद खुबसूरत लगा हर शब्द इस का
wah kmal, bemesaal. 'dard-e-kasmey pr humko too neebahna tha, yun jindge bhr kask-e-bekrare ka bojh uttahna tha'
सोचा हबीब जिसे, वो रकीब का मिलना था
दिल-ए-नादान को मिले, जख्मों को सिलना था
बहुत बढिया।
ये आग और नही,दिल की आग है नादां,
चिराग हो कि न हो,जल बुझेंगे परवाने।
क्या खबर थी सितमगर को जुल्म ढाना था
प्यार में उनके हमें धोखा ही खाना था
वफा हमारी में बेवफा उनको तो हो जाना था
हे पार्थ, मुहब्बत और वफा को जिस अंदाज में
शब्दों में पिरोया वाह! क्या कहने...
बेहद खुबसूरत ..बहुत उम्दा...वाह!
विजय जी, उमेश जी , रंजना जी , सीमा जी प्रीती जी और लेखनी के उस्ताद नीतिश राज जी और समीर जी आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने मेरी इन लाइनों की सराहना की आपकी ये सराहना ही मुझे लिखने के लिए ताकत देती है और मैं कुछ आप ही के शब्दों को जोडने का प्रयास मात्र करता हूं आपका तहेदिल से धन्यवाद
apki hosla afzai ke liye bahut shukriya..
waise ek bat hum bhi jan gaye ki aapki kalam main bhi bahut dhar hai ye ghayal karna janti hai..
keep it up
MEET
wah ji aap to likhne bhi lage tabhi to mai kahata tha ki aap chalte samay haath kyun hilate they apne aap se badbadate they ab samajh aaya
surender delhi pk
सोचा हबीब जिसे वो रकीब का मिलना था
दिल ए नादान को मिले जख्मों को सिलना था
bahut khoob.....dil ko choo liya
bahut sundar likha hai
मोहन जी
बड़ी प्यारी सी रचना दी है आपने....एक दिल से निकल कर दूसरे दिल तक का रास्ता खामोशी से तय करती हुई...रचना के साथ चित्र भी बड़े खूबसूरत और माकूल लगाये हैं आपने...बधाई.
नीरज
mohan ji bhaut acchi kavita hai.
क्या खबर थी सितमगर को जुल्म ढाना था
प्यार में उनके हमें धोखा ही खाना था
वफा हमारी में बेवफा उनको तो हो जाना था
kya likha hai tumne tum sach main cha hi gye bahut asha likha hai pyar ke baare. har ek word main sacchai nazar aati hai iske
बहुत सुंदर और उम्दा !
काबिले तारीफ़ है एक एक शब्द !
शुभकामनाए !
bhai, mohan maja aagaya. aapki kavitayan to kafi achchhi hain. bhavanao shacdo me dalna to aapse hi sihna hoga. isi tarah chachhe rahe...
लगता है जैसे मेरे दिल का कोई पन्ना चुराकर उसमे से लिखा ये गीत आपने.
वाह!
बहुत खूब.
vakai bhut badhiya rachana. ati uttam. likhte rhe.
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