तुम जब याद आते हो
तो रुलाते हो
जब याद नहीं आते
तो सताते हो
आखिर क्यूँ
क्या यही होती है चाहत
क्या यही प्रेम कहलाता है
अगर है यही प्रेम
तो है कडवा मगर बड़ा प्यारा
खुसनसीब हैं वों जो पीते हैं इस प्याले को
हो जाते हैं अमर
कर जाते हैं अमर
जो पीते हैं इस प्याले को
Wednesday, 3 February 2010
Saturday, 30 January 2010
कुछ लोग जमाने में...
कुछ लोग जमाने में ऐसे भी तो होते हैं
दफ्तर में जो हंसते हैं घर जाके वो रोते हैं
बीवी की नजरों में अच्छे हैं वो शौहर
बच्चों के कपड़ों को, जो शौक से धोते हैं
बच्चों के कपड़ों को, जो शौक से धोते हैं
रातभर बीवी की खिदमत में जुटते हैं
जाते ही वो दफ्तर में आराम से सोते हैं
कुर्सी पर लदे रहना, बस फितरत है इनकी
कुर्सी के ये खटमल, बेपैंदी के लौटे हैं
पंखों में परिंदों जैसी उड़ने की तमन्ना है
ये बात क्या समझेंगे जो पिंजरे के तोते हैं
सीने में हिमालय की कुल्फी के खजाने हैं
क्यों खवाब में चुस्की के पलकों को भिगोते हैं
ये लाइन maine http://gauravkumra84.blogspot.com/ is blog se li hain so koi bhi inhe anyatha na le
Sunday, 17 January 2010
आपका एक दोस्त
पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
..... आपका एक दोस्त
यह मैंने नहीं लिखी नेट पर घूमते हुए अचानक आँखों के सामने आ गयी और लगा की इसमें है कुछ बात जो दिल को छू गयी सो पोस्ट कर दी इसको मेरी लिखी हुयी न समझा जाए लेखक का नाम मुझे पता नहीं है अगर किसी को पता हो तो बता दें मैं उन सज्जन का नाम लगा दूंगा
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
..... आपका एक दोस्त
यह मैंने नहीं लिखी नेट पर घूमते हुए अचानक आँखों के सामने आ गयी और लगा की इसमें है कुछ बात जो दिल को छू गयी सो पोस्ट कर दी इसको मेरी लिखी हुयी न समझा जाए लेखक का नाम मुझे पता नहीं है अगर किसी को पता हो तो बता दें मैं उन सज्जन का नाम लगा दूंगा
Wednesday, 9 December 2009
खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी
सभी भाइयों के लिए एक खुश खबरी है अब जो भी शादीशुदा नहीं हैं खाशकर उन्ही के लिए क्यूंकि राखी सावंत ने इलेश को छोड़ दिया है तो अब सभी राखी के चाहने वाले खुश होकर जल्द राखी के होने वाले स्वन्वर में शामिल होने के लिए कमर कास लें
खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी
खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी
Thursday, 5 November 2009
पेट की खातिर या ठंड की खातिर
किसी काम से दिल्ली जा रहा था। रास्ते में आधी रात को एक स्टेशन पर गाडी रूकी। आंख खुल गई। तो बाहर जो नजारा देखा उसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं।
सुबह सुबह की मीठी मीठी
कुनकुनी सी ठंड
तन पर नाम मात्र कपडे
कंपकपाता जिस्म
सिकुड रहा है
अपने आप में
हाथ पेट की खातिर
आ रहा है चिथडों से बाहर
कोई राही
दे दे उसे रहम
राही उतरा एक
काम किया नेक
उतार कंबल अपना
ओढाया उसे
अब हाथ अंदर चला गया कंबल के
पेट की खातिर नहीं
ठंड से बचने की खातिर
सुबह सुबह की मीठी मीठी
कुनकुनी सी ठंड
तन पर नाम मात्र कपडे
कंपकपाता जिस्म
सिकुड रहा है
अपने आप में
हाथ पेट की खातिर
आ रहा है चिथडों से बाहर
कोई राही
दे दे उसे रहम
राही उतरा एक
काम किया नेक
उतार कंबल अपना
ओढाया उसे
अब हाथ अंदर चला गया कंबल के
पेट की खातिर नहीं
ठंड से बचने की खातिर
Tuesday, 20 October 2009
मतलब की दुनिया
उफ ये दुनिया ये मतलब की दुनिया
ये चेहरों पे चेहरे लगाती है दुनिया
ये भोले ये मासूम सुंदर से चेहरे
मगर दिल में इनके हैं काले अंधेरे
मतलब के रिश्ते बनाती है दुनिया
फिर तन्हा एक दिन छोड जाती है दुनिया
कभी दोस्त बनके हंसाती है दुनिया
कभी बनके दुश्मन रुलाती है दुनिया
कभी प्यार से लगाकर गले
पीछे से खंजर चुभोती है दुनिया
कभी खूबसूरत चेहरे पे न जाना
दिल देखकर फिर दिल को लगाना
इंसान को यही सिखाती है दुनिया
है दौलत यहां हर रिश्ते से ऊपर
दौलत के लिए अपनों का खून
बहाती है दुनिया
ऊफ ये दुनिया ये मतलब की दुनिया
-रजनी वशिष्ठ
(नोट - यह कविता मेरी पत्नी द्वारा लिखित है । )
ये चेहरों पे चेहरे लगाती है दुनिया
ये भोले ये मासूम सुंदर से चेहरे
मगर दिल में इनके हैं काले अंधेरे
मतलब के रिश्ते बनाती है दुनिया
फिर तन्हा एक दिन छोड जाती है दुनिया
कभी दोस्त बनके हंसाती है दुनिया
कभी बनके दुश्मन रुलाती है दुनिया
कभी प्यार से लगाकर गले
पीछे से खंजर चुभोती है दुनिया
कभी खूबसूरत चेहरे पे न जाना
दिल देखकर फिर दिल को लगाना
इंसान को यही सिखाती है दुनिया
है दौलत यहां हर रिश्ते से ऊपर
दौलत के लिए अपनों का खून
बहाती है दुनिया
ऊफ ये दुनिया ये मतलब की दुनिया
-रजनी वशिष्ठ
(नोट - यह कविता मेरी पत्नी द्वारा लिखित है । )
Thursday, 15 October 2009
दीपावली की शुभकामनाएं
दीपावली पर्व की आप सभी को समस्त परिवार सहित हार्दिक शुभकामनाएं वैभव लक्ष्मी आप सभी पर कृपा बरसाएं। लक्ष्मी माता अपना आर्शिवाद बरसाएं।
दूर कहीं गगन के तले
एक दीप की लौ नजर आई
जाकर पास देखा उसके
दीपक जल रहा था
बिना तेल के
मैंने पूछा दीपक से
तेल नहीं तो कैसे जल रहे हो तुम
तो दीपक ने जवाब दिया
कि
जिस तरह तुम इंसान
बिना तेल और बाती के
एक दूसरे से जल रहे हो
वैसे ही मैं भी
तुम इंसानों को देख कर
जल रहा हूं
छोड कर आपस का वैर
चलो जलाते हैं हम भी प्यार का दीपक
प्रेम को बना दीपक की बाती
इंसानियत से लो तेल का काम
फैलेगा शांति का प्रकाश चारो ओर
होंगे खुशहाल सभी
Sunday, 27 September 2009
जिंदगी कुछ वक्त दे मुझे
मेरा अपना घर
जिससे हूं मैं दूर
बहुत दूर
गाहे बगाहे घर जाना
और
जल्दी से घर से लौट वापस आना
क्या यही है जिंदगी
क्या यही है जिंदगी का दस्तूर
घर पर है मेरी बीमार मां
बीमार पिता
और मैं
अकेला
दूर घर से बहुत दूर
ना मां के दर्द को बांट पा रहा हूं
ना पिता की सेवा कर रहा हूं
आखिर क्यों
ऐसा जीवन जीने को मजबूर हूं
आखिर क्यों
क्या इसी को कहते हैं जीवन
क्या फायदा मेरे इस जीवन का
जो मैं अपनों के ही दुख दर्द में
उनका सहारा ना बनूं
क्यों नहीं कर पा रहा मैं उनकी सेवा
उनके बुढापे में
क्यों नहीं बन पा रहा मैं
उनके के बुढापे की लाठी
क्यों आखिर क्यों
क्यूं वक्त ले रहा इम्तिहान है
यूं ही ना गुजर जाए जिंदगी तमाम है
इम्तिहान से डरता नहीं हूं मैं
तूफानों से रूकता नहीं हूं मैं
सिर्फ मां के निस्वार्थ प्रेम को
भूलता नहीं हूं मैं
फिर कैसे उन्मुख हो जाऊं
कैसे कर्तव्य विमुख हो जाऊं
जिंदगी कुछ वक्त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं
जिससे हूं मैं दूर
बहुत दूर
गाहे बगाहे घर जाना
और
जल्दी से घर से लौट वापस आना
क्या यही है जिंदगी
क्या यही है जिंदगी का दस्तूर
घर पर है मेरी बीमार मां
बीमार पिता
और मैं
अकेला
दूर घर से बहुत दूर
ना मां के दर्द को बांट पा रहा हूं
ना पिता की सेवा कर रहा हूं
आखिर क्यों
ऐसा जीवन जीने को मजबूर हूं
आखिर क्यों
क्या इसी को कहते हैं जीवन
क्या फायदा मेरे इस जीवन का
जो मैं अपनों के ही दुख दर्द में
उनका सहारा ना बनूं
क्यों नहीं कर पा रहा मैं उनकी सेवा
उनके बुढापे में
क्यों नहीं बन पा रहा मैं
उनके के बुढापे की लाठी
क्यों आखिर क्यों
क्यूं वक्त ले रहा इम्तिहान है
यूं ही ना गुजर जाए जिंदगी तमाम है
इम्तिहान से डरता नहीं हूं मैं
तूफानों से रूकता नहीं हूं मैं
सिर्फ मां के निस्वार्थ प्रेम को
भूलता नहीं हूं मैं
फिर कैसे उन्मुख हो जाऊं
कैसे कर्तव्य विमुख हो जाऊं
जिंदगी कुछ वक्त और दे दे
मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो जाऊं
Monday, 21 September 2009
भारत धरती मां है हमारी
भारत धरती मां है हमारी
हम सब इसकी संतान
इससे है पहचान हमारी
हम इसकी पहचान
भारत धरती मां है हमारी
हम हैं भारत के बच्चे
ये हमको है अभिमान
दुश्मन इस पर नजर जो डाले
ले लें उसकी जान
भारत धरती मां है हमारी
अगर पडी जो इसे जरूरत
कभी हमारी जान की
इक पल की ना देर लगाएं
हंसकर दें बलिदान
भारत धरती मां है हमारी
(बिटिया के स्कूल में गीत फेस्टीवल था। तो कुछ सूझा नहीं हमारी पत्नी जी ने इन चार लाईनों को लिखा और बिटिया को सिखा दिया। हमारी बिटिया ने उसे अपनी तोतली सी आवाज में अपनी टीचर को सुनाया और काफी खुश हुईं। )
हम सब इसकी संतान
इससे है पहचान हमारी
हम इसकी पहचान
भारत धरती मां है हमारी
हम हैं भारत के बच्चे
ये हमको है अभिमान
दुश्मन इस पर नजर जो डाले
ले लें उसकी जान
भारत धरती मां है हमारी
अगर पडी जो इसे जरूरत
कभी हमारी जान की
इक पल की ना देर लगाएं
हंसकर दें बलिदान
भारत धरती मां है हमारी
(बिटिया के स्कूल में गीत फेस्टीवल था। तो कुछ सूझा नहीं हमारी पत्नी जी ने इन चार लाईनों को लिखा और बिटिया को सिखा दिया। हमारी बिटिया ने उसे अपनी तोतली सी आवाज में अपनी टीचर को सुनाया और काफी खुश हुईं। )
Tuesday, 8 September 2009
बन जा मेरी मात यशोदा
काफी दिन पहले मेरी धर्मपत्नी द्वारा लिखित एक भजन आज आपको पढा रहा हूं आशा है आप सभी को पसंद आएगी। यह भजन मेरी पत्नी ने जन्माष्टमी पर लिखा था लेकिन कुछ व्यस्तता के चलते आज इसे आप सभी को पढवा रहा हूं
तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्हा बन जाऊं
जा यमुना के तीरे मां
बंशी मधुर बजाऊं
इक छोटा सा बाग लगा दे
जहां झूमूं नाचू गाऊं
घर-घर जाकर माखन मिश्री
चुरा चुरा के खाऊं
इक छोटी सी राधा लादे
जिसके संग रास रचाऊं
तू ढूंढे मुझे वन उपवन
मैं पत्तों में छिप जाऊं
तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्हा बन जाऊं
तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्हा बन जाऊं
जा यमुना के तीरे मां
बंशी मधुर बजाऊं
इक छोटा सा बाग लगा दे
जहां झूमूं नाचू गाऊं
घर-घर जाकर माखन मिश्री
चुरा चुरा के खाऊं
इक छोटी सी राधा लादे
जिसके संग रास रचाऊं
तू ढूंढे मुझे वन उपवन
मैं पत्तों में छिप जाऊं
तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्हा बन जाऊं
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