Tuesday, 16 December 2008

आज के विजेता रहे

वाह जी ये तो बहुत ही मजेदार है हम तो खाम्‍हा खां ही डरे जा रहे थे कि कैसी दुकान चलेगी साथ में ये भी डर था कि कहीं हमारी जमानत ही तो जब्‍त नहीं हो जाएगी।
मेरे सामने एक समस्‍या आई कि इसका संचालन कैसे करना होगा। क्‍या है ना कि पढा लिखा ज्‍यादा नहीं हूं। अब हमने पहेली दे दी। तो सबसे पहले आए माननीय भाटिया जी अपने उसी अंदाज में और आते ही बता दिया कि जवाब उन्‍हें पता है लेकिन अभी बताएंगे नहीं और मैं उनकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हुआ और मन में बडी श्रद़धा भाव आए। धीरे धीरे बहुत ही जवाब आए लेकिन कईयों ने अपनी मंशा जाहिर नहीं होने दी। श्रुति जी ने तो यहां तक कह डाला कि कहीं ये मेरी जवानी का फोटो तो नहीं। फिर अल्‍पना जी आईं और बाजी मार गई। फिर क्‍या था फिर परमादरणीय मिश्रा जी भी आए और अपनी उंगली को गंगा जी में डाल कर बोले लो भाई हो गया गंगा स्‍नान और चल दिए अल्‍पना जी के जवाब की ओर फिर आए हमारे सभी के प्‍यारे आदरणीय ताई जी के ताऊ जी जैसे ताई ने बोला जल्‍दी से जा और अल्‍पना जी का जवाब टीप कर बोल दे और उन्‍होंने ताई के हुकुम की तामील करते हुए अल्‍पना जी के हक में एक वोट दे दिया और थोडा सा देरी से आईं लेकिन सही जवाब के साथ आईं रंजू जी। इसका सही जवाब यही है जी हां अमीषा पटेल और इसकी जानकारी आपको यहां से मिल सकती है

एक थोडी सी यहां पर मैं विनती करूंगा कि मुझे ज्ञान थोडा कम है इसलिए पता नहीं है कैसे पहेली का उत्‍तर बताया जाता है इसलिए मैं गुरू श्री भाटिया जी से भी अनुरोध करूंगा कि वो ही मेरे यहां पर विनर रहे अल्‍पना वर्मा जी को विजेता घोषित करें और कल फिर से एक नई पहेली लेकर आऊंगा और कल की पहेली हो सकता है थोडी सी मुश्किल हो। तो कल तक के लिए आप सभी से आज्ञा चाहूंगा


आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया और सभी विजेताओं को बधाई

बताओ जवाब पाओ ईनाम

नमस्‍कार दोस्‍तों
कई दिन हो गए अपनी प्रस्‍तुति नहीं दे पाया। दरअसल पता नहीं क्‍या हो गया कुछ लिखा ही नहीं जा रहा तो सोचा किसी न किसी तरह से तो अपनी प्रस्‍तुति दे ही देनी चाहिए । और बस आ गया मैं भी भाटिया जी की तरह आपकी खिदमत में एक आसान सा सवाल लेकर। बस आप झट से देखें इस तस्‍वीर को बता दो इनका नाम। हिंट ये होगा कि ये बालीवुड से संबंधित है। सही जवाब देने वालों को आकर्षक ईनाम तो जल्‍दी से बताओ जवाब पाओ ईनाम कांटेस्‍ट में भाग लिजीए


हम भी देखें कि भाटिया जी की दुकानदारी तो अच्‍छी चल रही है हमारी कितनी चलती है

Tuesday, 9 December 2008

पापा आ जाओ

वह मासूम कली थी
अभी तो वह खिली थी
बीमार नहीं थी, पर लग रही थी
गोद में मां की अपनी
बेतहाशा जो बिलख रही थी
वह जिद कर रही थी
और रो रो कर कह रही थी
मुझे गुड्रडा नहीं
सचमुच के पापा चाहिएं
जो कहा कर गए थे कि
वह जल् घर आएंगे
और साथ में अपने
ढेर से कपडे और खिलौने
उस के लिए लाएंगे
फिर शहजादी को अपनी परी बनाएंगे
गोद में उठाकर
मेला ईद का दिखाने ले जाएंगे
पर
रमजान गुजर गया पूरा
और कल ईद होने वाली है
सब खुश हैं
पर
वह रो रही है
बेतहाशा बिलख रही है
और
पापा के अपने
आने की आहट सुन रही है
जबकि
रात एक फौजी चाचा आया था
साथ अपने ढेर से कपडे और
खिलौने भी लाया था
इन खिलौनों में एक गुड्रडा भी है
जिस पर एक टैग लगा है
और टैग पर रहमत बैग लिखा है

कृत
श्री एस एस हसन
एवं
फोटो साभार गूगल

Wednesday, 3 December 2008

कुछ नहीं हो सकता मेरा

क्‍यूं कुछ नहीं हो सकता मेरा
क्‍यूं सब कहते हैं ऐसा
शायद ठीक ही तो कहते हैं
कुछ नहीं हो सकता मेरा

अगर होता मै आम
तो डल जाता मेरा आचार
अगर होता नींबू
तो मिर्ची के साथ मिलकर
कम से कम
शनिवार के दिन
घर और दुकानों पर
दिया जाता मैं टांग
क्‍यूं कुछ नहीं हो सकता मेरा
क्‍यूं सब कहते हैं ऐसा
शायद ठीक ही तो कहते हैं
कुछ नहीं हो सकता मेरा

क्‍या वाकई कुछ नहीं हो सकता मेरा
बताए कोई असलियत दिखाए कोई
है कोई ऐसा मेरे जैसा
जो मेरा हमसफर बने
कुछ नहीं हो सकने की सूरत में
मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाए
और
मेरे साथ किसी दुकान और घर
के मुहाने पर अपने आप को टंगाए
क्‍या वाकई कुछ नहीं हो सकता मेरा

क्‍या कुछ नहीं हो सकता मेरा
क्‍यूं सब कहते हैं ऐसा
शायद ठीक ही तो कहते हैं
कुछ नहीं हो सकता मेरा

देखो और बताओ

कल रात को मैं ऐसे ही लेटे लेटे टीवी देख रहा था कि एक चैनल पर जाकर नजर रूक गई। एक फिल्‍म आ रही थी जो बंटवारे के ऊपर बनी थी। बहुत ही मार्मिक कहानी है क्‍यूंकि देश का बंटवारा हमने तो देखा नहीं और देखा भी होगा तो याद नहीं क्‍योंकि पिछले जन्‍म की बात है। रात डेढ बजे तक फिल्‍म को देखता रहा लेकिन चैनल पर नाम डिस्‍पले नहीं हुआ। और मैं आधी फिल्‍म देखता देखता ही सो गया। टीवी भी चालू ही रहा सुबह करीब पांच बजे आंख खुली तो देखा टीवी चल रहा है पर फिल्‍म अब वो नहीं है। अब इस फिल्‍म को देखने का बहुत दिल कर रहा है कि आगे क्‍या होता है। क्‍या हुआ था बंटवारे में। अब आप सभी से अनुरोध है कि इस क्लिप को देखकर मुझे फिल्‍म का नाम बताएं ताकि मेरी रूह को सुकून मिल सके। इंटरनेट के मामले में थोडा कच्‍चा हूं। तो मुझे इंतजार है फिल्‍म को देखने का


Saturday, 29 November 2008

मैग्‍जीन का ब्‍लाग

ब्‍लागिंग जगत में शायद सौ में से 80 फीसदी मीडिया से भी जुडे होंगे। तो आज मैं सभी के लिए एक बहुत ही अच्‍छे ब्‍लाग के बारे में जानकारी दूंगा। जहां पर आपको मिलेगा एक से बढकर एक मैग्‍जीन का लेआउट कंटेंट एवं फोटोग्राफस। ये ब्‍लाग है आदरणीय प्रदीप कुशवाह जी का। वैसे मैग्‍जीन प्रेमी एक बार इस ब्‍लाग पर आकर जरा देखें अपने अपने स्‍वादानुसार मसाला। जैसे फिल्‍मी, धार्मिक, भ्रमण एवं सेहत से लबालब मसाले के साथ । बस झट से उनके ब्‍लाग पर जाकर उनका उत्‍साहवर्धन करें। उनके ब्‍लाग पर जाने के लिए यहां पर क्लिक करें

Tuesday, 25 November 2008

फूल की दास्‍तां

एक फूल बहुत ही सुंदर
मनभावन पर चंचल
ख्वाब लिए नैनों में अपने
होगा सवेरा प्रभु के चरणों मे...
जीवन सफल हो जाएगा उसका
मोक्ष उसे मिल जाएगा
एक फूल बहुत ही सुंदर
मगर विधि का विधान ही कुछ और
चला नही उस पर किसी का जोर
एक बेदर्द हवा का झोंका आया
फूल को राह मे उसने फैंका
परों तले कुचला गया,
और धूल मे वो मिल गया
तितर बितर उसके अंग
बिखर गया उसक हर रंग
किसी ने उसका दर्द न जाना
चूर चूर हो गया उसका
सपना सुहाना
होगा सवेरा प्रभु के चरणों मे...
जीवन सफल हो जाएगा उसका

Saturday, 15 November 2008

टूट गया याराना

आज प्‍यार से प्‍यार का टूट गया याराना
आया है याद वो गांव का खंडहर पुराना
जहां होती थी हम दोनों की रोज मुलाकातें
कुछ मीठी सी नोंक झोंक और कुछ प्‍यारी सी बातें

वो खंडहर, हमारी अनमोल चाहत का था महल
ना जाने किसकी लगी हमारे प्‍यार को नजर
एक पल में जुदा कर गया वक्‍त मुझसे मेरे यार को
कुछ इस कदर उठा तूफान जमाने की बंदिशों का
कि फना हो गई हमारी मोहब्‍बत की कहानी

रुका तूफान तो निगाहों ने ढूंढा मेरे प्‍यार को
देखा कि वो पुराना खंडहर ढह चुका था
और उसके साथ ही दफन हो गया
वो हमारे प्‍यार का महल

Wednesday, 12 November 2008

मेरा साया

मेरा हमदम मेरा दोस्‍त है मेरा साया
हर समय हर पल
रहता है साथ
मेरा साया

सुख में दुख में
आंधी तूफान में
मेरे साथ है
मेरा साया

कभी थकता नहीं कभी रुकता नहीं
चलता ही जाता है
साथ मेरे
मेरा साया

सूखी नदी में पैर फिसल गया
मुझे संभाला खुद गिर गया
मेरा साया

पर्वत ने रोका रास्‍ता मेरा
न रुकने दिया चलाता रहा मुझे
मेरा साया

दोस्‍तों ने छोड दिया साथ
न होने दिया कभी उदास
हंसता रहा साथ मेरे
मेरा साया

Tuesday, 11 November 2008

मैं क्‍या हूं...

बहुत दिनों से ब्‍लाग से मेरा संपर्क नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे शरीर के किसी अंग ने काम करना ही बंद कर दिया। बहुत तकलीफ होती थी। जब सोचता था कि इतने दिनों तक की जुदाई आखिर कैसे सही है मैंने। बताने के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं। आज कुछ लिखने का काफी मन बन गया और सोचा चाहे आज कुछ भी हो जाए एक पोस्‍ट तो लिखूंगा ही लेकिन जैसे ही मेल चैक की तो उसमें बहुत ही महान ब्‍लागरों की मेल देखी जिसमें लिखा था कि आगे भी बढो। पढकर एकबारगी तो सोचने पर मजबूर हो गया कि ब्‍लाग के पहले मैं क्‍या था और आज महान महान विद्वान मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं और मुझे आगे बढने के लिए कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मेरी खुशी का ठिकाना ही ना रहा क्‍योंकि अब मैं अकेला नहीं हूं। आज ना लिख पाने के लिए क्षमा चाहता हूं लेकिन कल से अवश्‍य इस ब्‍लाग को नियमित कर लूंगा। बस आप सभी का यही आशीर्वाद की कामना करता हूं। बस ये चार लाईने जैसे ही जहन में आई तो इन्‍हीं चार लाईनों को सांझा कर रहा हूं ...

सोचता हूं आज मैं

क्‍या था कुछ दिनों पहले मैं

शायद किसी कवि की रचना

के किसी शब्‍द की मात्रा का

सौंवा भाग भी नहीं हूं मैं

शायद किसी रेगिस्‍तान के

रेत के एक कण के माणिद भी नहीं हूं मैं

कोई बताए मुझे

मैं क्‍या हूं मैं क्‍या हूं मैं क्‍या हूं