Wednesday, 3 December 2008

कुछ नहीं हो सकता मेरा

क्‍यूं कुछ नहीं हो सकता मेरा
क्‍यूं सब कहते हैं ऐसा
शायद ठीक ही तो कहते हैं
कुछ नहीं हो सकता मेरा

अगर होता मै आम
तो डल जाता मेरा आचार
अगर होता नींबू
तो मिर्ची के साथ मिलकर
कम से कम
शनिवार के दिन
घर और दुकानों पर
दिया जाता मैं टांग
क्‍यूं कुछ नहीं हो सकता मेरा
क्‍यूं सब कहते हैं ऐसा
शायद ठीक ही तो कहते हैं
कुछ नहीं हो सकता मेरा

क्‍या वाकई कुछ नहीं हो सकता मेरा
बताए कोई असलियत दिखाए कोई
है कोई ऐसा मेरे जैसा
जो मेरा हमसफर बने
कुछ नहीं हो सकने की सूरत में
मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाए
और
मेरे साथ किसी दुकान और घर
के मुहाने पर अपने आप को टंगाए
क्‍या वाकई कुछ नहीं हो सकता मेरा

क्‍या कुछ नहीं हो सकता मेरा
क्‍यूं सब कहते हैं ऐसा
शायद ठीक ही तो कहते हैं
कुछ नहीं हो सकता मेरा

16 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

भाई आपका कुछ क्यों नही हो सकता और आचार ओ हम पहले ही बने हुए हैं ! :)

रामराम !

makrand said...

bahut khub

परमजीत बाली said...

अपने मनोभावों को सुन्दर शब्द दिए हैं।आध्यात्म की ओर पहला कदम है यह कविता।

makrand said...

bahut khub likha mohan ji
regards

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह भाई मोहन जी सटीक व्यंग्य

Kuldeep said...

ऐ अजनबी दोस्त हमें देख के हम तुझे याद दिलाने आये हैं
कुछ नही हो सकता तेरा लेकिन दोस्ती ज़रूर हो गई है ...

mehek said...

अगर होता नींबू
तो मिर्ची के साथ मिलकर
कम से कम
शनिवार के दिन
घर और दुकानों पर
दिया जाता मैं टांग
har kisi ka astitva kuch na mayane rakhta hai ahut badhiya

"अर्श" said...

bahot hi khub likha hai aapne wah... dhero badhai aapko sahab....

राज भाटिय़ा said...

:) अजी हमे क्या मालुम ??

मुसाफिर जाट said...

अरे मोहन जी, क्यों नहीं हो सकता? हर व्यक्ति का अपना अस्तित्व होता है. निराश ना हों.

seema gupta said...

अगर होता नींबू
तो मिर्ची के साथ मिलकर
कम से कम
शनिवार के दिन
घर और दुकानों पर
दिया जाता मैं टांग
" what a beautiful thoughts of yours..... but aapka kyun kuch nahi ho skttaa...."

Regards

विनय said...

सार्थक मनोभाव!

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

कभी कभी कुछ न होना ही कुछ भी होने से बेहतर होता है।

रंजना said...

yadi yah abhivyakti gahre awsaad aur nairashya ke kshano kee hai,to kahungi ki ishwar ne jo hame aseemit samarthya diya hai,uska niradar karna hai yah.

yun awsaad ke kshano me aise bhaav sahaj hi man me aate hain ,par jaldi hi inse bahar nikal jana chahiye.
ho skta hai ham jo karna chahte hain usme hame safalta nahi mila rahi par,ho sakta hai niyanta ne hamare liye kuchh aur hi nirdharit kar rakha ho....

waise abhivyakti shashakt aur sarthak hai,isme koi do ray nahi.

Udan Tashtari said...

धीरज धरो मोहन बाबू...उत्साह जगाओ. बहुत कुछ होगा मगर मायूसी ठीक नहीं. सब्र रखो..सुनहरी सुबह के पहले का धुंधलका मानो इन विचारों को तो.

dr.bhoopendra singh said...

Your writings symbolises your dissatifaction regarding our system where a capable person has nothing to do positive .
dr.bhoopendra