पेड के उपर चढा आदमी
ऊचा दिखाई देता है !
जड मे खडा आदमी
नीचा दिखाई देता है !
आदमी न ऊचा होता है, न नीचा होता है,
न बडा होता है,न छोटा होता है !
आदमी सिर्फ़ आदमी होता है !
पता नहीं इस सिधे, सपाट सत्य को
दुनिया क्यों नहीं जानती ?
और अगर जानती है,
तो मन से क्यों नहीं मानती ?
किसी संत कवि ने कहा है की
मनुष्य के उपर कोइ नहीं होता,
मुझे लगता है कि मनुष्य के उपर उसका मन होता है !
छोटे मन से कोइ बडा नहीं होता,
टुटे मन से कोइ खडा नहीं होता !
आदमी की पहचान,
उसके धन या आसन से नहीं होती,
उसके मन से होती है !
मन की फकीरी पर
कुबेर की संपदा भी रोती है !
-श्री.अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा रचित |
वन्दे मातरम् !!!
Sunday, 10 October 2010
Friday, 10 September 2010
तड़पन
आखिर आज पुकार ही लिया
मुझे उसने
मेरे नाम से
ले ही लिया आखिर
मेरा नाम
अपनी जुबान पर
लेकिन क्यूँ
पता नहीं क्यूँ
बस पता है तो
ये ही कि
मेरा नाम आज आखिर
उसने लिया है
अपनी जुबान पर
तड़पता था मैं
सुनने के लिए
उसके मुहँ से अपना नाम
मुझे उसने
मेरे नाम से
ले ही लिया आखिर
मेरा नाम
अपनी जुबान पर
लेकिन क्यूँ
पता नहीं क्यूँ
बस पता है तो
ये ही कि
मेरा नाम आज आखिर
उसने लिया है
अपनी जुबान पर
तड़पता था मैं
सुनने के लिए
उसके मुहँ से अपना नाम
Friday, 16 July 2010
आंसू हैं मेरे साथ
आँखों से गिरते आंसूं
दिल में उठती टीस
नहीं है कोई अपना
सिर रखने को
जो देता मुझे कन्धा
पोंछ देता
मेरे बहते आंसू
भाई का लाड
मां-बाप का दुलार
दोस्तों का प्यार
छूट गया अब
सब अपनों का साथ
बस रह गए तो केवल
आंसू
नहीं है अब इन्हें पोंछने वाला कोई
सभी हैं आंसू देने वाले
इस दुनिया में
मेरे जैसे का होता है यही हाल
कोई तो होना ही चाहिए
आंसू हैं मेरे साथ
दिल में उठती टीस
नहीं है कोई अपना
सिर रखने को
जो देता मुझे कन्धा
पोंछ देता
मेरे बहते आंसू
भाई का लाड
मां-बाप का दुलार
दोस्तों का प्यार
छूट गया अब
सब अपनों का साथ
बस रह गए तो केवल
आंसू
नहीं है अब इन्हें पोंछने वाला कोई
सभी हैं आंसू देने वाले
इस दुनिया में
मेरे जैसे का होता है यही हाल
कोई तो होना ही चाहिए
आंसू हैं मेरे साथ
Tuesday, 6 July 2010
उदासी का आलम
आज तुम उदास होमैं भी उदास हूँ
सारा जहाँ उदास है
इस उदासी को दूर कर दो
अपनी एक मुस्कराहट देकर
सूरज निकला
लेकिन
देखकर तुम्हारी उदासी का आलम
वों दमकना भूल गया
भूल गया की उसे
करना है रोशन जहाँ को
पर कर न सका रोशन
देखकर तुम्हारी उदासी का आलम
बादल आये
घन घोर घटायें लाये
पर बरस न सके
देखकर तुम्हारी उदासी का आलम
बरसना ही भूल गए
एक रहम तुम
जहाँ पर कर दो
करने दो रोशन जहाँ को
बरसने दो बादलों को
तोड़कर तुम अपनी
उदासी का आलम
Friday, 25 June 2010
तेरी अदा
मोटी मोटी आँखें
रंग आँखों का काला
नागिन सी जुल्फें काली
घटा सी भारी भारी
लहराती है कमर पर
जब चलती है तू इठलाकर
वों तेरा बातें करना
व़ो तेरा हंसना मुस्कुराना
रूठकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना
कर जाता है घायल
हो जाते हैं कायल
चलता है जब
इक तीर जिगर पर
जब देखती है तू आँखें मिचलाकर
नहीं है ठीक सीने जिगर पर
अंखियों का वार करना
तेरा बंद आँखों से सब कुछ कह जाना
कर जाता है घायल
तुम्हारा अपने आप में यूँ सिमट जाना
मगर जब
कहते हो बातें भी न करना
न हाल दर्दे दिल का सुनना
और न अपने दिल का हाल सुनाना
मार डालेगा ये बेरुखी का आलम तुम्हारा
रंग आँखों का काला
नागिन सी जुल्फें काली
घटा सी भारी भारी
लहराती है कमर पर
जब चलती है तू इठलाकर
वों तेरा बातें करना
व़ो तेरा हंसना मुस्कुराना
रूठकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना
कर जाता है घायल
हो जाते हैं कायल
चलता है जब
इक तीर जिगर पर
जब देखती है तू आँखें मिचलाकर
नहीं है ठीक सीने जिगर पर
अंखियों का वार करना
तेरा बंद आँखों से सब कुछ कह जाना
कर जाता है घायल
तुम्हारा अपने आप में यूँ सिमट जाना
मगर जब
कहते हो बातें भी न करना
न हाल दर्दे दिल का सुनना
और न अपने दिल का हाल सुनाना
मार डालेगा ये बेरुखी का आलम तुम्हारा
Saturday, 12 June 2010
आंगन में पंछी आए ख्वाब सजाने को
आंगन में पंछी आए ख्वाब सजाने को
आँखों में सपने लाये ,कुछ कर दिखाने को
कुछ सपने पीछे छूटे पलकों पे आंसू बनके
कुछ अपने पीछे छूटे पलकों पे आंसू बनके
कुछ ख्वाब झांकते हैं आँखों में मोती बनके
कुछ वादे अपनों के हैं ,कुछ वादे अपने से
कल दुनिया महकेगी फूल जो आज खिलने को हैं ....2
खिलने दो रंगों को फूलों को अपने संग
महकेगी दुनिया सारी ,बहकेगी अपने संग
ख्वाबों के परवाजो से आसमान झुकाने को है........2
आंगन में पंछी आए ख्वाब सजाने को
आँखों में सपने लाये ,कुछ कर दिखाने को
क़दमों की आहट अपनी दुनिया हिला देगी
यारों की यारी अपनी हर मुश्किल भुला देगी
यह रचना आदरणीय दिव्या प्रकाश दुबे जी की है जिसको मैंने उनके ब्लॉग से लिया है
दिव्य प्रकाश दुबे
Divya Prakash Dubey
आँखों में सपने लाये ,कुछ कर दिखाने को
कुछ सपने पीछे छूटे पलकों पे आंसू बनके
कुछ अपने पीछे छूटे पलकों पे आंसू बनके
कुछ ख्वाब झांकते हैं आँखों में मोती बनके
कुछ वादे अपनों के हैं ,कुछ वादे अपने से
कल दुनिया महकेगी फूल जो आज खिलने को हैं ....2
खिलने दो रंगों को फूलों को अपने संग
महकेगी दुनिया सारी ,बहकेगी अपने संग
ख्वाबों के परवाजो से आसमान झुकाने को है........2
आंगन में पंछी आए ख्वाब सजाने को
आँखों में सपने लाये ,कुछ कर दिखाने को
क़दमों की आहट अपनी दुनिया हिला देगी
यारों की यारी अपनी हर मुश्किल भुला देगी
यह रचना आदरणीय दिव्या प्रकाश दुबे जी की है जिसको मैंने उनके ब्लॉग से लिया है
दिव्य प्रकाश दुबे
Divya Prakash Dubey
Wednesday, 9 June 2010
क्या लिखूँ
कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ या दिल का सारा प्यार लिखूँ
कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूं या सापनो की सौगात लिखूँ
मै खिलता सुरज आज लिखू या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ
वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की साँस लिखूँ
वो पल मे बीते साल लिखू या सादियो लम्बी रात लिखूँ
मै तुमको अपने पास लिखू या दूरी का ऐहसास लिखूँ
मै अन्धे के दिन मै झाँकू या आँन्खो की मै रात लिखूँ
मीरा की पायल को सुन लुँ या गौतम की मुस्कान लिखूँ
बचपन मे बच्चौ से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूँ
सागर सा गहरा हो जाॐ या अम्बर का विस्तार लिखूँ
वो पहली -पाहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ
सावन कि बारिश मेँ भीगूँ या आन्खो की मै बरसात लिखूँ
गीता का अर्जुन हो जाऊं या लकां रावन राम लिखूँ
मै हिन्दू मुस्लिम हो जाऊं या बेबस ईन्सान लिखूँ
मै ऎक ही मजहब को जी लुँ या मजहब की आँखें चार लिखूँ
वो पल मे बीते साल लिखू या सादियो लम्बी रात लिखूँ
मै तुमको अपने पास लिखू या दूरी का ऐहसास लिखूँ
मै अन्धे के दिन मै झाँकू या आँन्खो की मै रात लिखूँ
मीरा की पायल को सुन लुँ या गौतम की मुस्कान लिखूँ
बचपन मे बच्चौ से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूँ
सागर सा गहरा हो जाॐ या अम्बर का विस्तार लिखूँ
वो पहली -पाहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ
सावन कि बारिश मेँ भीगूँ या आन्खो की मै बरसात लिखूँ
गीता का अर्जुन हो जाऊं या लकां रावन राम लिखूँ
मै हिन्दू मुस्लिम हो जाऊं या बेबस ईन्सान लिखूँ
मै ऎक ही मजहब को जी लुँ या मजहब की आँखें चार लिखूँ
Monday, 7 June 2010
राम का लैटर सीता के लिए पंजाबी में...
प्यारी सीता,
मैं इथे राजी ख़ुशी से हाँ and hope ke tu v ठीक ठाक hovengi,
लक्ष्मण रात नु तेनु बहुत याद करदा सी.
मैं इस बन्दर दे हाथ तेनु चिट्ठी bhej reha हाँ,
तू bilkul tension ना layi मैं बहुत jaldi tenu ravan कोलो छुड़ा लवांगे
मैं AIRTEL दा postpaid ले लिया सी, RAVAN nu मैं mobile te बहुत गालियाँ काढिया te साले ने काट ditta,
चल कोई ni मैंने आना ता है ही. Taan KUTUNGA उसनू
मैं इथे राजी ख़ुशी से हाँ and hope ke tu v ठीक ठाक hovengi,
लक्ष्मण रात नु तेनु बहुत याद करदा सी.
मैं इस बन्दर दे हाथ तेनु चिट्ठी bhej reha हाँ,
तू bilkul tension ना layi मैं बहुत jaldi tenu ravan कोलो छुड़ा लवांगे
मैं AIRTEL दा postpaid ले लिया सी, RAVAN nu मैं mobile te बहुत गालियाँ काढिया te साले ने काट ditta,
चल कोई ni मैंने आना ता है ही. Taan KUTUNGA उसनू
मैं तेरे naal भी एक AIRTEL ka prepaid bhej riya सी usme 1500 SMS free
wali scheme हा, तू रोज़ मेरे को SMS kari.
Chinta ना kari, जब भी gal करने को जी करे, एक miss call मार diyo.
मैं यहाँ से tenu बात कर levenga.
तू मेरे bill दी chinta ना kariyo, Sugreev nu payment दा jimma दे ditta
si.
Accha OK
See U.
With Luv
दशरथ दा Vadda पुत्तर "राम
7:40 pm (4 hours ago)
COOL:
wali scheme हा, तू रोज़ मेरे को SMS kari.
Chinta ना kari, जब भी gal करने को जी करे, एक miss call मार diyo.
मैं यहाँ से tenu बात कर levenga.
तू मेरे bill दी chinta ना kariyo, Sugreev nu payment दा jimma दे ditta
si.
Accha OK
See U.
With Luv
दशरथ दा Vadda पुत्तर "राम
7:40 pm (4 hours ago)
COOL:
ऑरकुट से साभार
Saturday, 5 June 2010
आदत
रास्ते में ही छोड़कर उन्हे जाने कि आदत है
वो मेरे हर झूठ से खुश होती,
जिसे हमेशा सच बोलने की आदत थी,
वो एक आंसू भी गिरने पर खफा होती थी,
जिसे तन्हाई में रोने की आदत थी,
वो कहती थी की मुझे भूल जाओगे,
जिसे मेरी हर बात याद रखने की आदत थी,
हमेशा माफ़ी मांगने के बहाने से,
रोज़ गलतियाँ करना उसकी आदत थी,
वो जो दिल जान न्योछावर करती थी मुझ पर,
मगर छोटी सी बात पर रूठना उसकी आदत थी,
हम उसके साथ चल दिए पर ये नहीं जानते थे,
की रास्ते में ही छोड़कर उन्हे जाने कि आदत है,,
लोग कहते हैं ज़मीं पर किसी को खुदा नहीं मिलता
शायद उन लोगों को दोस्त कोई तुम-सा नहीं मिलता
किस्मतवालों को ही मिलती है पनाह कीसी के दिल में
यूं हर शख़्स को तो जन्नत का पता नहीं मिलता
अपने सायें से भी ज़यादा यकीं है मुझे तुम पर
अंधेरों में तुम तो मिल जाते हो, साया नहीं मिलता
इस बेवफ़ा ज़िन्दगी से शायद मुझे इतनी मोहब्बत ना होती
अगर इस ज़िंदगी में दोस्त कोई तुम जैसा नहीं मिलता
ऑरकुट से साभार
वो मेरे हर झूठ से खुश होती,
जिसे हमेशा सच बोलने की आदत थी,
वो एक आंसू भी गिरने पर खफा होती थी,
जिसे तन्हाई में रोने की आदत थी,
वो कहती थी की मुझे भूल जाओगे,
जिसे मेरी हर बात याद रखने की आदत थी,
हमेशा माफ़ी मांगने के बहाने से,
रोज़ गलतियाँ करना उसकी आदत थी,
वो जो दिल जान न्योछावर करती थी मुझ पर,
मगर छोटी सी बात पर रूठना उसकी आदत थी,
हम उसके साथ चल दिए पर ये नहीं जानते थे,
की रास्ते में ही छोड़कर उन्हे जाने कि आदत है,,
लोग कहते हैं ज़मीं पर किसी को खुदा नहीं मिलता
शायद उन लोगों को दोस्त कोई तुम-सा नहीं मिलता
किस्मतवालों को ही मिलती है पनाह कीसी के दिल में
यूं हर शख़्स को तो जन्नत का पता नहीं मिलता
अपने सायें से भी ज़यादा यकीं है मुझे तुम पर
अंधेरों में तुम तो मिल जाते हो, साया नहीं मिलता
इस बेवफ़ा ज़िन्दगी से शायद मुझे इतनी मोहब्बत ना होती
अगर इस ज़िंदगी में दोस्त कोई तुम जैसा नहीं मिलता
ऑरकुट से साभार
Sunday, 9 May 2010
मां तुझे सलाम
सर्वप्रथम आप सभी को मांतृत्व दिवस की हार्दिक बधाईं इस उपलक्ष्य पर मैं मां के लिए दो शब्द आपके सामने प्रस्तुत करना चाह रहा हूं आशा है आप सबको पसंद आएंगे
मेरी मां
बूढी है मगर
अभी भी बच्चों के लिए
रखती है हौंसला
अपने 40 साल के बेटे को
गोद में उठाने की और
उसे वही लाड प्यार करने की
जो करती थी तब
जब वह खुद थी 40 साल की और
बेटा था कुछ ही साल का
मगर क्या हुआ
अभी भी उसकी बाजुओं में जान नहीं
लेकिन उसका ये निस्वार्थ प्यार
है ना उसके साथ
मेरी मां
बूढी है मगर
अभी भी बच्चों के लिए
रखती है हौंसला
अपने 40 साल के बेटे को
गोद में उठाने की और
उसे वही लाड प्यार करने की
जो करती थी तब
जब वह खुद थी 40 साल की और
बेटा था कुछ ही साल का
मगर क्या हुआ
अभी भी उसकी बाजुओं में जान नहीं
लेकिन उसका ये निस्वार्थ प्यार
है ना उसके साथ
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