Thursday, 26 February 2009

तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे

(फोटो पर क्लिक करके बडा कर सकते हैं जी)
आप पढ रहे हैं 'राजेन्‍द्र नाथ रहबर जी' की एक गजल खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे

Friday, 13 February 2009

नया साल मनाएंगे

श्री शाहिद सहन जी उर्दू और हिंदी के जाने माने शायर हैं। यह नाम किसी पहचान को मोहताज नहीं है। शौकिया तौर पर शायरी करने वाले श्री हसन जी के ख्‍यालों में नर्मी है। उनका अपनी बात को कहने का सरल सहज और सादगीपूर्ण ढंग उन्‍हें भीड से अलग करता है। अब तक उन्‍होंने ढेरों कविताएं, गजल, शायरी और भिन्‍न भिन्‍न विषयों पर लेख लिखें हैं। उनके बारे में बताने के लिए मेरे पास शब्‍द ही नहीं हैं बस आप उनकी एक कविता जो उन्‍होंने नववर्ष पर लिखी थी पढो और आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं।
श्री हसन साहब ने एक ब्‍लाग भी शुरू किया है जिसका निर्माण अभी चल रहा है एक बार यहां पर क्लिक कर उनकी और भी रचनाएं आप यहां पर पढ सकते हैं और उनका कमेंट कर उत्‍साहवर्धन कर सकते हैं तो पेश है उनकी एक रचना आपकी खिदमत में

नया साल मनाएंगे

नए साल में हम
आइनों का शहर बसाएंगे
मुर्दा जिस्‍मों को अपने
आईने दिखाएंगे
फिर
पत्‍थर उठाएंगे मारेंगे नहीं
भाग जाएंगे
इस तरह हम
नया साल मनाएंगे

नए साल में हम
पौधा नीम का लगाएंगे
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा और
कालिसा के पानी से
उसको नहलाएंगे
फिर
जलाकर गीली पत्तियां उसकी
धुआं खूब उडाएंगे
इस तरह हम
नया साल मनाएंगे

नए साल में हम
पतंगें उडाएंगे
दूर तक ले जाएंगे
सरहद पर आसमानों की
पेंच लडाएंगे
फिर
वो काटा, वो काटा
कहकर शोर
खूब मचाएंगे
इस तरह हम
नया साल मनाएंगे

नए साल में हम
पहिया रोटी का बनाएंगे
खूब दौडाएंगे
खूब दौडाएंगे
फिर
जाकर
आंगन में पडोसी के
छोड आएंगे
इस तरह हम
नया साल मनाएंगे

नए साल में हम
सूली एक बनाएंगे
खुद को उस पर सजाएंगे
रोऐंगे, पीटेंगे और चिल्‍लाएंगे
फिर
जाकर जिस्‍म में दूसरों के
छुप जाएंगे
इस तरह हम
नया साल मनाएंगे

नए साल में हम
नदियों की माला बनाएंगे
मंगलम बस्तियां बसाएंगे
सूरज से आंखें लडाएंगे और
फिर
चांद को खा जाएंगे
इस तरह हम
नया साल मनाएंगे

Wednesday, 4 February 2009

ट्रेन की बर्थ पर लेटी एक लडकी















ट्रेन की बर्थ पर लेटी एक लडकी
जो अभी मासूम है
अभी तो वह भोली है
जिन्दगी को समझना अभी बाकी है
ट्रेन की बर्थ पर लेटी एक लडकी

रात की हल्‍की हल्‍की सर्दी
ले रही है उसे अपने आगोश में
और वह लडकी सिमट रही है
अपने आप में
मानो एक नई नवेली दुल्‍हन
शर्माकर, घबराकर सिकुड जाती है अपने आप में
जब होता है उसका मिलन
ट्रेन की बर्थ पर लेटी एक लडकी

बचने के लिए सर्दी से
ले रही है अपने आप को
शाल के आगोश में
कभी सिर तो कभी पैर
रह जाते हैं बाहर उसके
फिर भी कर रही है
कोशिश बार बार
ट्रेन की बर्थ पर लेटी एक लडकी

चाय वाले की आवाज सुन
हुई उठ खडी वो लडकी
चाय ली एक घूंट पीया
और अनुभव किया गर्मी को
चेहरे पर मुस्‍कुराहट दौड आई
ट्रेन की बर्थ पर लेटी एक लडकी

अब
फिर से लिया अपने आप को
उस शाल के आगोश में
महसूस किया गर्मी को
और फिर चली गई
गहरी नींद के आगोश में
ट्रेन की बर्थ पर लेटी एक लड़की
-मोहन वशिष्‍ठ

Saturday, 31 January 2009

तिडकन

नमस्‍कार दोस्‍तों सर्वप्रथम आप सभी को बंसतोत्‍सव की हार्दिक बधाई
आज मैं आपको एक कविता पढाता हूं पंजाब की जानी मानी कवियत्री डॉ. पाल कौर जी के सौजन्‍य से। मुझे पूरा यकीन है कि यह कविता आपको जरूर बहुत ही पसंद आएगी। तो पेश है आज की कविता "तिडकन" आपकी खिदमत में . . .



कवि को होती है औरत में
माशूक की तलाश
औरत को होती है आदमी में
कवि की तलाश
तराजू फिर भी बराबर तुलती है
पढाई,कमाई, ऊपर से अलबेली
सुंदर, सुशील
अपनी-अपनी तलाश ले घूमते
टकराते और घट जाती शादी
पलों में ही लेकिन उडने लगती खुशबू
खुरने लगते हैं रंग
सुबह से शाम, काम से काम में
घिसने लगती है वह
आने लगती है उसके कपडों से
कभी सब्जियों, कभी बच्‍चों के पोतडों
और कभी दवायों की बदबू
जिस कीचड में उतरती है वह हर रोज
कंवल की तरह खिल कर निकलता बाहर
कवि पति
डब्‍बे पैक करती भूल जाती है वह धीरे धीरे
उसे चूमकर विदा करना
सजती-संवरती, धोती-नहाती
पढाती, खिलाती भूल जाती है धीरे धीरे
शाम को संवर-संवर कर बैठना
खुरदरे हो जाते हैं हाथ
पकने लगते हैं नक्‍श कहीं
उभरने लगती है झुर्री कोई
थक हार कर सो जाती
बेहोश मारती खर्राटे
बस रह जाती हैं
पत्‍नी, मां
मरने लगती है माशूक धीरे-धीरे
कवि पति रखता अपनी संभाल
साफ-शफाफ उठता
साफ-शफाफ जाता
कविताएं लिखता, श्रोता ढूंढता
सपनों को तिडकना सुनता
निकल जाता बाहर
सरेराह, सरेबाजार
मिल जाती खुशबू ताजा
उदासियां गाता, शब्‍दों के महल उसारता
कविताएं लिखता, कविताएं उचारता
बाहर डू नाट डिस्‍टर्ब की प्‍लेट
कोमल हाथों से निवाला खाता
जी उठता है कवि आशिक
लिखता है कविताएं छपती किताबें
वह गोल-मोल शब्‍दों के समर्पण करता
हर माशूक पर लिखता किताब भर कविताएं
ठोस दीवारें उठाई रखती
कंधों पर छत
तोतले बोलों में देखता कल
परतता बार-बार
कवि पति खुशबुएं ढूंढता
भागता जंगल-जंगल
बारिश, आंधियां माशूक को सौंप
आ छुपता वह घर अंदर बार-बार
पत्‍नी उसकी धीरे-धीरे भूल जाती
उसका कवि होना
कवि पति धीरे धीरे भूल जाता
उसका माशूक होना
-डॉ. पाल कौर

Friday, 23 January 2009

क्‍यूं ना ऐसे वतन पे हो हमको गुमां

प्यारा अपना भारत , ये भारत महान
देखो इसमें बसती हम सब की है जान

जाने कैसा कैसा इसमे इतिहास छुपा है
कभी जी भर रोया तो कभी खूब हंसा है
भला किया है जन जन का इसने
बुरा ख़ुद बहुत चुप सहा है इसने


इस गौरवमयी भारत को मेरा प्रणाम
प्यारा अपना भारत , ये भारत महान
देखो इसमें बसती हम सब की है जान
कितनी दफा दुश्मनों ने चाहा इसे मिटाना
छीन आजादी इसको मिटटी में मिलाना
लेकिन इस धरती ने जन्मे सपूत महान
मिटा दिया दुश्मनों को देके अपनी जान
क्‍यूं ना ऐसे वतन पे हो हमको गुमां
प्यारा अपना भारत , ये भारत महान
देखो इसमें बसती हम सब की है जान

Tuesday, 13 January 2009

हंसी का ठहाका लगाओ जरा धीरे से

हमें तो अपनों ने लूटा
गैरों में कहां दम था
मेरी हड्डी वहाँ टूटी,
जहाँ हॉस्पिटल बन्द था.


हमें तो अपनों ने लूटा
गैरों में कहां दम था
मेरी कार वहां खराब हुई
जहाँ गैराज बन्द था।

मुझे जिस एम्बुलेन्स में डाला,
उसका पेट्रोल ख़त्म था.
मुझे रिक्शे में इसलिए बैठाया,
क्योंकि उसका किराया कम था.

मुझे डॉक्टरों ने उठाया,
नर्सों में कहाँ दम था.
मुझे जिस बेड पर लेटाया,
उसके नीचे बम था.

मुझे तो बम से उड़ाया,
गोली में कहाँ दम था.
और मुझे सड़क में दफनाया,
क्योंकि कब्रिस्तान में फंक्शन था
नैनो मे बसे है ज़रा याद रखना,
अगर काम पड़े तो याद करना,
मुझे तो आदत है आपको याद करने की,
अगर हिचकी आए तो माफ़ करना.......

ये दुनिया वाले भी बड़े अजीब होते है
कभी दूर तो कभी क़रीब होते है
दर्द ना बताओ तो हमे कायर कहते है
और दर्द बताओ तो हमे शायर कहते है .......


एक मुलाक़ात करो हमसे इनायत समझकर,
हर चीज़ का हिसाब देंगे क़यामत समझकर,
मेरी दोस्ती पे कभी शक ना करना,
हम दोस्ती भी करते है इबादत समझकर........

नमस्‍कार दोस्‍तों आज मुझे मेरे एक खास दोस्‍त शेखर का दिल्‍ली से मेल आया मेल खोला तो देखा कि उसमें यह हास्‍य व्‍यंग्‍य है तो सोचा कि अभी लिखना तो हो नहीं पा रहा हे क्‍यों ना अपनी उपस्थिति दर्ज ही करा देंवें सो यह एक हास्‍य व्‍यंग्‍य यहां पर आपके सामने प्रस्‍तुत कर दिया है और यदि किसी भाई ने पहले ही यह ब्‍लाग पर लगा रखा हो तो मुझे बता दें मैं तुरंत ही हटा लूंगा क्‍योंकि यह मेरी अपनी रचना नहीं है और हां इसे हटवाने के लिए मुझे तीन दिन के अंदर ही बता दें तीन दिन के बाद किसी की कोई बात मान्‍य नहीं होगी फिर इसका फैसला ब्‍लाग जगत के दिग्‍गजों को सौंप दिया जाएगा।

Sunday, 4 January 2009

कैसे निकले कैद से


आज कई दिनों के बाद
आखिर
बादलों की कैद से
हुआ आजाद वो
आते ही बाहर
खिलखिला कर हंस पडा
और
अपनी आजादी का जश्‍न मनाता रहा
मगर उसका यह जश्‍न
नहीं चला ज्‍यादा देर
कुछ ही देर में बादलों ने
फिर से लिया घेर
घबरा कर
डरकर
भाग उठा फिर
हुई खत्‍म आजादी
खत्‍म हुआ जश्‍न
बादलों ने आजादी पर उसकी
पानी दिया फेर
खुश हुए बादल कुछ इस तरह
कि पानी दिया गेर
घबराता हुआ कांपता हुआ
जा पहुंचा वो
बादलों की कैद में
अब सोच रहा है
कैसे निकले वो
बादलों की कैद से

Friday, 2 January 2009

मेरे ब्‍लाग को बचा लो

नमस्‍कार जी
आज मेरे सामने एक दुविधा आ गई है। इस दुविधा का निवारण आप हम और हम सभी को मिलकर दूर करना ही होगा तो जल्‍दी से मेरी प्रोबल्‍म को सोल्‍व करो
मैंने एक ब्‍लाग का टेमपलेट लेकर अपने ब्‍लाग पर कापी किया बाद में कुछ एरर आए
फिर से कोशिश की । अब मेरा ब्‍लाग पूर्णतया- नहीं खुल रहा मैं क्‍या करूं कोई सुझाव दो और मेरे ब्‍लाग को बचाने में मेरी मदद करो मेरा ब्‍लाग है मोहन का मन

http://mohankaman.blogspot.com/

प्‍लीज जल्‍दी रिप्‍लाई कर मेरी मदद करो

Thursday, 1 January 2009

नववर्ष की नव बेला

नव प्रभात नव अरुण रस्मी हो.
नूतन पथ नेह नूतन हो
मृदुल मृदुल मृदु विहगों का कल
नव वसंत में नित नूतन हो
नव प्रकाश की नवल ज्योति का
जीवन में संचार नवल हो

कृत श्री त्रिलोचन भट़ट जी

Wednesday, 31 December 2008

आ रहा है नया साल ले लो मेरी भी मुबारकबाद

कुछ ही पलों में आने वाला नया साल आप सभी के लिए
सुखदायक
धनवर्धक
स्‍वास्‍थ्‍वर्धक
मंगलमय
और प्रगतिशील हो


यही हमारी भगवान से प्रार्थना है