Thursday, 12 June 2008

मिल गया खजाना कुबेर ...

आधी रात को बेटे ने
सोते से जाग
मुस्‍कुरा कर देखा
दूर हो गई चिंताएं
मिल गया खजाना कुबेर का

नहीं करता मैं याद ...


नहीं करता मैं तुमको याद

क्‍योंकि याद करने के लिए
पडता है भूल जाना
कर नहीं सकता मैं ये
दुष्‍कर्म अपना

जब तुम नहीं थे जिंदगी में मेरी

करता था उसको याद मैं

उसको आज भी करता हूं याद मैं

क्‍योंकि याद करने के लिए

पडता है भूल जाना

मां, बाप, भाई, बहन और बच्‍चे

कभी भी नहीं करता किसी को याद मैं

क्‍योंकि याद करने के लिए पडता है भूल जाना

तुम भी मत करना कभी

भूले से याद मुझको

क्‍योंकि याद करने के लिए

पडता है भूल जाना

Sunday, 8 June 2008

हाय महंगाई...


हमारे भारत देश में पिछले चार सालों में पैट्रोल और डीजल में करीब 15 व 12 रुपए की बढोतरी हुई है। शाबास हमारी भारत सरकार। आखिर अब साबित होने लगा है कि देश में महंगाई थमने का नाम नहीं लेगी। यह महंगाई तो सुरसा राक्षसी की तरह मुंह खोले खडी है। अब यहीं पर देख लीजिए हमारी एसएमएस सरकार ने पैट्रोल हाल ही में 5 रूपए बढाकर जनमानस को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। डीजल के दामों में भी बढोतरी कर दी है। बहुत अच्‍छा कदम रहा है ये भी। बेचारे किसान भाई जो अभी तक सोचते थे कि खेतों के लिए पानी इंजन से ही दे देंगे क्‍योंकि बिजली पहले तो आती ही नहीं बामुश्किल दिन में 3-4 घंटे ही आती है और वैसे भी महंगी ही होती है लेकिन अब सरकार ने किसानों का यह संशय भी खत्‍म कर दिया क्‍योंकि अब तो डीजल भी बिजली जैसा ही महंगा साबित होगा। हमारे देहात में एक कहावत है कि "खा ले या बूंक ले जाना तो पेट में ही है" तो चाहे अब खेतों के लिए पानी बिजली से दो या डीजल इंजन से दो महंगा तो दोनों ही हैं। चलो खैर कुछ भी सही शायद सरकार ने अपना बजट देखकर ही यह कदम उठाया है। ठीक है भाई अब कर भी क्‍या सकते हैं। हां एक काम तो अब कर ही सकते हैं या तो हम कोई बडे अफसर बन जाएं कि जो गाडी पेट्रोल से चलेगी उसका खर्चा कम्‍पनी या सरकार उठा ले तो चलती रहे वरना भाई फिर से ही हमें तो लग रहा है कि हमें तो अपनी रामप्‍यारी का ही दामन थामना पडेगा। अब भाई ऐसा तो कर नहीं सकते कि जाकर वेजेनुएला या सउदी अरब से कुछ पेट्रोल खरीद लाएं मानां कि वहां पेट्रोल 2 रुपए और 5 रूपए लीटर है लेकिन इतनी गाडी तो हमारे पास हैं नहीं कि पेट्रोल लाएं और उसका खर्चा भी वहन कर सकें। खैर अब देखते हैं कैसे चलती है अपनी गाडी अब 55 रूपए लीटर में या तो गाडी ही रोड पर नहीं तो हम ही आ जाएंगे रोड पर रही सही कसर निकाल दी गैस पर चलो जैसे तैसे पेट्रोल की टेंशन खत्‍म की चाय पीने के इंतजार में बैठे तो बैठे ही रह गए। भाई सिलेंडर खत्‍म हो गया। चलो सिलेंडर लेने जाकर पता चला कि भाईसाहब जी अमूमन तो सिलेंडर है नहीं फिर भी अगर मिलेगा तो अब 500 का मिलेगा। मैने कहा भाई क्‍यूं अब तक तो आप मुझे 400 का ही देते थे। तो जनाब बोले अब तक मैं आपको सिलेंडर 100 रूपए ब्‍लैक में देता था। 300 का तो सिलेंडर था ही 100 रूपए ब्‍लैक के हो गए चार सौ लेकिन 50 रूपए अब एसएमएस ने भी तो बढा दिए। मैंने कहा तो भाई उस हिसाब से भी तो 450 ही हुए ना तो जनाब कहने लगे भाई महंगाई का जमाना है मेरे घर का सिलेंडर भी खत्‍म होने वाला है अब जब डीजल पैट्रोल बढने पर बस वाले आटो वाले अपना किराया बढा सकते हें तो मैं अपना भाव नहीं बढा सकता क्‍या? तो भाई अब क्‍या करें बडी उलझन हो गई। हमने तो अपने घर में मार्बल डलवा दिया हमें क्‍या पता था कि गैस के दाम गैस के साथ इतने उपर उठ जाएंगे कि सिलेंडर हाथ भी नहीं आए।

Thursday, 5 June 2008

वह छू गई मुझे


कल
वह छू गई मुझे
अपने धानी आंचल को झटकती हुई
एक खुशबू भटकती रही
पोर पोर में रच बस गई
उस की सुगन्‍ध
उस की रेशमी स्‍मृतियां
क्षितिज के सुर्ख गालों पर
लिख गई एक इबारत
गुम्‍बज के शिखर पर
आज उस की प्रतीक्षा में
खडा हूं सौन्‍दर्य उपासक की तरह
नहीं लौटी है अभी तक
उसी राह से वह
लगता है
वह उन्‍हीं पहाडी खण्‍डहरों में
खो गई है कहीं
कुर्बान हो गई है
मग्‍न और जीर्ण स्‍मृतियां
मेरे भीतर चमकने लगी हैं
और चांद काव्‍यात्‍मक लगने लगा है
देवदार दबी दबी आवाजों में
फुसफुसाने लगे हैं
मेरी इस हरकत पर
उस अनिग्रह पहाडी हवा से
इश्‍क हो गया है मुझे
-रमेश सोबती

Tuesday, 27 May 2008

माता लक्ष्‍मी जी की अनोखी कहानी
एक दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर भ्रमण करने और वहाँ पर रहने वाले लोगों को देखने की इच्छा माता लक्ष्मी को बतायी । तो माता लक्ष्मी ने कहा कि हे प्रभु मैं भी आपके साथ चल सकती हूँ क्या । तब विष्णु भगवान ने एक मिनट सोचा और कहा कि ठीक है चलो परन्तु एक शर्त है । तुम उत्तर दिशा की तरफ नहीं देखोगी ।माता लक्ष्मी ने अपनी सहमति दे दी और वे शीघ्र ही पृथ्वी पर भ्रमण के लिये निकल गये । पृथ्वी बहुत ही सुन्दर दिख रही थी और वहाँ पर बहुत ही शान्ति थी । देखते ही माता लक्ष्मी बहुत ही खुश हुई और भूल गयी कि भगवान विष्णु ने उनसे क्या कहा था । वह उत्तर दिशा में देखने लगी । तभी उन्हें बहुत ही खुबसूरत फूलों का एक बगीचा दिखा जहाँ पर बहुत ही सुन्दर खुशबू आ रही थी । वह एक छोटा सा फूलों का खेत था । माता लक्ष्मी बिना सोचे ही उस खेत पर उतरी और वहाँ से एक फूल तोड़ लिये । भगवान विष्णु ने जब यह देखा तो उन्होंने माता लक्ष्मी को अपनी भूल याद दिलायी । और कहा कि किसी से बिना पूछे कुछ भी नहीं लेना चाहिये । इस पर भगवान विष्णु के आँसू आ गये ! माता लक्ष्मी ने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान विष्णु से माफी माँगी । तब भगवान विष्णु बोले कि तुमने जो भूल की है उसके लिये तुम्हें सजा भी भुगतनी पड़ेगी । तुम जिस फूल को बिना उसके माली से पूछे लिया है अब तुम उसी के घर में 3 साल के लिये नौकरानी बनकर उसकी देखभाल करोगी । तभी मैं तुम्हें बैकुण्ड में वापिस बुलाऊंगा ।माता लक्ष्मी एक औरत का रुप लिया और उस खेत के मालिक के पास गयी । मालिक का नाम माधवा था । वह एक गरीब तथा बड़े परिवार का मुखिया था । उसके साथ उसकी पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियां एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थी । उनके पास सम्पत्ति के नाम पर सिर्फ वही एक छोटा सा भूमि का टुकड़ा था । वे उसी से ही अपना गुजर बसर करता था । माता लक्ष्मी उसके घर में गयी तो माधवा ने उन्हें देखा और पूछा कि वह कौन है । तब माता लक्ष्मी ने कहा कि मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं है मुझ पर दया करो और मुझे अपने यहाँ रहने दो मैं आपका सारा काम करुँगी । माधव एक दयालु हृदय का इनसान था लेकिन वह गरीब भी था, और वह जो कमाता था उसमें तो बहुत ही मुश्किल से उसी के घर का खर्चा चलता था परन्तु फिर भी उसने सोचा कि यदि मेरे तीन की जगह चार बेटियाँ होती तब भी तो वह यहाँ रहती यह सोचकर उसने माता लक्ष्मी को अपने यहाँ शरण दे दी । और इस तरह माता लक्ष्मी तीन साल तक उसके यहाँ नौकरानी बनकर रही । जैसे ही माता लक्ष्मी उसके यहाँ आयी तो उसने एक गाय खरीद ली और उसकी कमाई भी बढ़ गयी अब तो उसने कुछ जमीन और जेवर भी खरीद लिये थे और इस तरह उसने अपने लिये एक घर और अच्छे कपड़े खरीदे । तथा अब हर किसी के लिये एक अलग से कमरा भी था ।इतना सब मिलने पर माधव ने सोचा कि यह सब कुछ मुझे इसी औरत (माता लक्ष्मी) के घर में प्रवेश करने के बाद मिला है वही हमारे भाग्य को बदलने वाली है । 2.5 साल निकलने के बाद माता लक्ष्मी ने उस घर में प्रवेश किया और उनके साथ एक परिवार के सदस्य की तरह रही परन्तु उन्होंने खेत पर काम करना बन्द नहीं किया । उन्होनें कहा कि मुझे अभी अपने 6 महीने और पूरे करने है । जब माता लक्ष्मी ने अपने 3 साल पूरे कर लिये तो एक दिन की बात है कि माधव अपना काम खत्म करके बैलगाड़ी पर अपने घर लौटा तो अपने दरवाजे पर अच्छे रत्न जड़ित पोशाक पहने तथा अनमोल जेवरों से लदी हुई एक खुबसूरत औरत को देखा । और उसने कहा कि वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी है ।तब माधव और उसके घर वाले आश्चर्य चकित ही रह गये कि जो स्त्री हमारे साथ रह रही थी वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी स्वयं थी । इस पर उन सभी के नेत्रों से आँसू की धारा बहने लगी और माधवा बोला कि यह क्या माँ हमसे इतना बड़ा अपराध कैसे हो गया । हमने स्वयं माता लक्ष्मी से ही काम करवाया ।माता हमें माफ कर देना । तब माधव बोला कि हे माता हम पर दया करो । हममे से कोई भी नहीं जानता था कि आप माता लक्ष्मी है । हे माता हमें वरदान दीजिये । हमारी रक्षा करिये ।तब माता लक्ष्मी मुस्कुरायी और बोली कि हे माधव तुम किसी प3कार की चिन्ता मत करो तुम एक बहुत ही दयालु इनसान हो और तुमने मुझे अपने यहाँ आसरा दिया है उन तीन सालों की मुझे याद है मैं तुम लोगों के साथ एक परिवार की तरह रही हूँ । इसके बदले में मैं तुम्हें वरदान देती हूँ कि तुम्हारे पास कभी भी धन की और खुशियों की कमी नहीं होगी । तुम्हें वो सारे सुख मिलेंगे जिसके तुम हकदार हो ।यह कहकर लक्ष्मी जी अपने सोने से बने हुये रथ पर सवार होकर बैकुण्ठ लोक चली गयी ।यहाँ पर माता लक्ष्मी ने कहा कि जो लोग दयालु, और सच्चे हृदय वाले होते है मैं हमेशा वहाँ निवास करती हूँ । हमें गरीबों की सेवा करनी चाहिये । इस कहानी का यह उपदेश है कि जब छोटी सी गलती पर भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को भी सजा दी तो हम तो बहुत ही मामूली इनसान है । फिर भी भगवान की हमेशा हम पर कृपा बनी रहती है । हर किसी इनसान को दूसरे इनसान के प्रति दयालुता का भाव रखना चाहिये हमें जो भी कष्ट और सुख मिल रहे है वह हमारे पुराने जन्मों के कर्म है ।अतः अन्त में यही कहना चाहूंगा कि हर किसी को भगवान पर श्रद्घा और सबुरी रखनी चाहिये अन्त में वही हमारी नैया पार लगाते है ।

Thursday, 22 May 2008

चट़टानें

मैं उन सुरम्य घाटियों से गुजर रही हूं

जहां चट्टानें भाषा जानती हैं

ठंड महसूस करती हैं

सिरहन में इनके भी काँपते हैं हौंठ

हरी काली कहीं

कहीं बदरंग भूरी

रंगों के प्रति सजग फिर भी

जिस्म की ठोस इच्छाओं से बिंधी

प्रकृति की हर आवाज को सुनती हैं ये चट़टानें

एक शब्द बचाती हैं अपने भीतर

सारे आत्मीय स्‍पर्श

लौटाने के लिए हमें

मैं उन सुरम्य घाटियों से गुजर रहीं हूँ

एक झरना जहाँ बह रहा है

एक लाल चिड़िया जहाँ मेरा इंतजार कर रही है

-सविता सिंह

चवन्‍नी की किस्‍मत


घर से निकला, सडक पर पहुंचा
और देखा तो हैरान हो गया
सडक किनारे एक चवन्‍नी पडी थी
पुरानी सी मैली सी गंदी सी
पडी पडी कराह रही थी
लोगों की राहें ताक रही थी
और सोच रही थी कि
शायद
कोई आए और उसे उठाए
फिर अपने माथे से छुआए
लेकिन वाह री उसकी किस्‍मत
जिस चवन्‍नी का कभी सिक्‍का चलता था
जिसके लिए लोग तरसते थे
आज वही चवन्‍नी
पडी पडी लोगों के लिए तरस रही है
अपनी किस्‍मत को कोस रही है
और सोच रही है कि
शायद
कोई आए और उठाए
फिर अपने माथे से छुआए

Wednesday, 21 May 2008

निखर गया धरती का यौवन...



कल की बारिश से
निखर गया धरती का यौवन...
डोल गया पेडों का मन
मचल गए पंछी सारे
निखर गया धरती का यौवन...
एक एक पत्‍ता पत्‍ता
एक एक डाली डाली
डाल रहे इक दूजे की पाती
निखर गया धरती का यौवन...
मेंढक भी टर्राए अब तो
चींटियां भी आई निकल कर
पंछी भी कर रहे मृदंग अब तो
निखर गया धरती का यौवन...

Tuesday, 20 May 2008

बारिश

आज बारिश गिर रही है
रह रहकर गिर रही है
बादलों के बीच से आज बिजली गरज रही है
और कह रही है
ना रोको बारिश को, ना टोको बारिश को
कितने यौवन से प्‍यासी थी धरा
कितने अरसे से प्‍यासे थे तरूवर
कितने दिनों से सूखी थी बयार
मिटाने दो प्‍यास सभी की
ना रोको बारिश को, ना टोको बारिश को
मयूर आज नाचेगा जी भर
मयूर आज गाएगा जी भर
कभी डाल-डाल कभी पात-पात
उछल कूद मचाएगा वानर
मिटाने दो प्‍यास सभी की
ना रोको इस बारिश को, ना टोको इस बारिश को
आज बारिश गिर रही है
रह रहकर गिर रही है
बादलों के बीच से आज बिजली गरज रही है
और कह रही है
ना रोको बारिश को, ना टोको बारिश को

Sunday, 18 May 2008

चिडियों ने घर नहीं बनाया

एक दीवार बनाई
दूसरी दीवार बनाई
तीसरी फिर चौथी दीवार बनाई
छत डाल दी लेकिन
फिर भी अधूरा रह गया घर
चिडिया ने घोंसला नहीं बनाया
शीशे लगाए, खिडकी दरवाजे लगाए
मार्बल भी डलवाया
फिर भी अधूरा रह गया घर
चिटियों ने जगह नहीं बनाई