माता लक्ष्मी जी की अनोखी कहानी
Tuesday, 27 May 2008
Thursday, 22 May 2008
चट़टानें
मैं उन सुरम्य घाटियों से गुजर रही हूं
जहां चट्टानें भाषा जानती हैं
ठंड महसूस करती हैं
सिरहन में इनके भी काँपते हैं हौंठ
हरी काली कहीं
कहीं बदरंग भूरी
रंगों के प्रति सजग फिर भी
जिस्म की ठोस इच्छाओं से बिंधी
प्रकृति की हर आवाज को सुनती हैं ये चट़टानें
एक शब्द बचाती हैं अपने भीतर
सारे आत्मीय स्पर्श
लौटाने के लिए हमें
मैं उन सुरम्य घाटियों से गुजर रहीं हूँ
एक झरना जहाँ बह रहा है
एक लाल चिड़िया जहाँ मेरा इंतजार कर रही है
-सविता सिंह
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/22/2008 04:39:00 PM
चवन्नी की किस्मत
फिर अपने माथे से छुआए
लेकिन वाह री उसकी किस्मत
जिस चवन्नी का कभी सिक्का चलता था
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/22/2008 02:21:00 PM
Wednesday, 21 May 2008
Tuesday, 20 May 2008
बारिश
आज बारिश गिर रही है
रह रहकर गिर रही है
बादलों के बीच से आज बिजली गरज रही है
और कह रही है
ना रोको बारिश को, ना टोको बारिश को
कितने यौवन से प्यासी थी धरा
कितने अरसे से प्यासे थे तरूवर
कितने दिनों से सूखी थी बयार
मिटाने दो प्यास सभी की
ना रोको बारिश को, ना टोको बारिश को
मयूर आज नाचेगा जी भर
मयूर आज गाएगा जी भर
कभी डाल-डाल कभी पात-पात
उछल कूद मचाएगा वानर
मिटाने दो प्यास सभी की
ना रोको इस बारिश को, ना टोको इस बारिश को
आज बारिश गिर रही है
रह रहकर गिर रही है
बादलों के बीच से आज बिजली गरज रही है
और कह रही है
ना रोको बारिश को, ना टोको बारिश को
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/20/2008 05:45:00 PM
Sunday, 18 May 2008
चिडियों ने घर नहीं बनाया
एक दीवार बनाई
दूसरी दीवार बनाई
तीसरी फिर चौथी दीवार बनाई
छत डाल दी लेकिन
फिर भी अधूरा रह गया घर
चिडिया ने घोंसला नहीं बनाया
शीशे लगाए, खिडकी दरवाजे लगाए
मार्बल भी डलवाया
फिर भी अधूरा रह गया घर
चिटियों ने जगह नहीं बनाई
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/18/2008 12:22:00 PM
Friday, 16 May 2008
नई कमीज
मैं नई कमीज पहन
तुम्हें खत लिख रहा हूं
किस तरह महसूस कर रही है
वह मेरे शरीर से बातें करती
अभी थोडी देर पहले
पसीने से मिली थी
अभी थोडी देर बाद
धूल को मिलेगी
कैसा लगेगा उसे
साबुन से मिलना
मेरी पत्नी के हाथों धोए जाना
नई कमीज चमकती धूप में
तार पर लटकती
सूखती, क्या सोचेगी
मैं तुम्हें खत लिख रहा हूं
नई कमीज पहन कर।
-गुरप्रीत
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/16/2008 02:27:00 PM
कलयुगी बेटा
एक खबर पढी
बेटे ने मां की जान ली
दुख हुआ कलेजा मुहं को आया
हे कलयुगी बेटे जिस मां ने तुझे
अपना खून देकर, अपनी जिंदगी देकर
नया जीवन दिया आज तूने ही
उसके खून से अपने हाथों को रंग लिया
लेकिन हे मां ये नादान था
पागल था
जो समझ ना सका तुझको
लेकिन तू तो मां है ना
मां अपने बेटे को माफ करती है
बेटे को खुश रहो का आर्शिवाद देती है
लेकिन
अब डर लग रहा है मां
जब और मांओं को पता लगेगा
उसका बेटा बडा होकर
उसी का कातिल बनेगा
तो कहीं ऐसा तो नहीं
कि हे मां तू बेटों को जन्म
देना ही छोड दे
और इसका खामियाजा
पूरी दुनिया भुगते
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/16/2008 12:58:00 PM
दर्पण
दर्पण एक सच्चा दोस्त
जो बताता है मेरी
सच्चाई को
मेरी बुराई को
और मैं उससे
करता हूं अपने
दिल के हर
दुख दर्द को सांझा
क्योंकि एक वो ही तो है
जो ना मेरे दुखों पर मेरा
मजाक बनाता है
और मेरे खुश होने पर
बहुत खुश होता है
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/16/2008 12:36:00 PM
उदासी
फिर देखता हूं
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/16/2008 12:31:00 PM
Thursday, 15 May 2008
और कविता खत्म हो गई
एक बच्चा घर की मुंडेर पर
हाथ में खाने की चीज लिए हुए
अपनी मां के साथ
कभी चीज को निहारता
कभी खाता
और
खाता ही जाता
लेकिन
खाते-खाते सोचता
कि
कम-कम खाऊं
ताकि
जल्दी खत्म न हो
यदि कोई मांगे तो
दूर से ही दिखाना
और
जल्दी से अपना हाथ पीछे खींच लेता
अपनी चीज किसी को नहीं देता
ये ही तो उस बच्चे का बचपन है
यही तो उस बच्चे
का जीवन है
लेकिन ये क्या
कविता खत्म हो गई
और बच्चे की चीज
हाथ में अभी भी
बाकी है
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/15/2008 11:22:00 PM
पिताजी
सुबह-सुबह सूर्य की किरणें
हमारी छत पर पडती
और मेरे पिताजी
चिडियों को दाना डालने जाते
चिडियों का झुंड आता
और मेरे पिताजी की हथेली से
दाने चुगता
अब ना तो सूर्य की किरणें ही
हमारी छत पर पडतीं हैं
और ना ही चिडिया
दाना चुगने आती हैं
सूर्य की किरणें मधम पड गई
या
चिडियों को ही किसी ने मार दिया
-विजय मौदगिल
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/15/2008 11:21:00 PM
संगीत
कहां है संगीत
जो हम चिडियों की चहचहाहट में सुनते थे
कहां है संगीत
जो हम झरते हुए झरने, नदी और नहरों के पानी में सुनते थे
कहां है संगीत
जो हवा चलने पर पत्तों की खडखडाहट से पैदा होता था
शायद हमने उस संगीत को दबा दिया
मैं सुनना चाहता हूं वो संगीत
कोई सुनाओ मुझे वो संगीत
-विजय मौदगिल
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/15/2008 11:20:00 PM
संगीत
मैंने सुना है संगीत
एक बच्चे से
जिसके हाथ में है इकतारा
वो गा रहा है
मां हुंदी ऐ मां ओ दुनिया वालियों
मैंने सुना है संगीत
उसके फटे हुए कपडों से
जिसमें से गा रहा है उसका बदन
मैंने सुना है संगीत
रेल के ठंडे फर्श पर रखे उसके नंगे पांव से
मैंने सुना है संगीत
ठंड से नीले पड गए उसके होंटों से
मैंने सुना है संगीत
उसकी आंखों से
जो लोगों के हाथ में तलाश रहीं हैं एक रूपया
यह संगीत मुझे उदास कर देता है
-विजय मौदगिल
को मोहन वशिष्ठ 9988097449 द्वारा 5/15/2008 11:19:00 PM













